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Rohtak News: हरियाणा की प्राचीन रेजा कला को जीवित रख रहीं ललिता चौधरी

Sat, 15 Nov 2025 02:58 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक
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16...ललिता चौधरी । - फोटो : संवाद
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संवाद न्यूज एजेंसी
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रोहतक। रेजा यानी देशी कपास का कण। हाथ से बने इसके रेजा वस्त्रों का प्रयोग भले ही प्राचीन समय से लेकर सदियों तक होता रहा हो लेकिन करीब 150 साल पूर्व यह लुप्त होने की कगार पर आ गया। लुप्त हो रही हरियाणा की इस प्राचीन रेजा कला को अब रोहतक की ललिता चौधरी जीवित रख रही हैं।
शहर के वार्ड 10 में शामिल गांव बोहर निवासी ललिता का मानना है कि रेजा हमारी प्राचीन संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रहा है। कभी हरियाणा के अलावा राजस्थान व गुजरात तक इसका व्यापक क्षेत्र रहा। इसी कारण वे इस कला में दोबारा प्राणी फूंक रही हैं।
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देसी कपास से बने रेजा वस्त्रों का विदेशों में भी प्रचार-प्रसार कर रही हैं। इसके चलते वे 2017 में हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल कप्तान सिंह सोलंकी के हाथों सम्मानित हो चुकी हैं। वर्ष 2013 से इस कार्य में जुटी ललिता ने अब तक 1000 से अधिक महिलाओं को इसके प्रति जागरूक करते हुए उन्हें प्रशिक्षण भी दिया है। उनके इस जज्बे को राष्ट्रीय स्तर पर भी खूब सराहा गया है।
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2013 में पहली बार रेजा को जाना
ललिता बताती हैं कि 2013 में उन्हें पहली बार रेजा के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने प्रदेशभर में भ्रमण कर बुजुर्गाें से रेजा के विषय में विस्तार से बातचीत की तो पुराने पहलू सामने आए। बुजुर्गों ने बताया कि पुराने समय से लेकर 40 से 50 साल पहले तक भी समाज में हाथ के बने कपड़ों को महत्व देते थे लेकिन औद्योगिक करण के चलते यह रेजा कला लुप्त होती चली गई और युवा पीढ़ी बुजुर्गों के अनुभवों से दूर होती गई। इस कारण हमारी इस कला व संस्कृति का काफी नुकसान हुआ जिसे अब दोबारा से जीवंत किया जा रहा है।
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