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Rohtak News: ब्रिटिश कॉल में भालौठ के लालचंद को मिली थी राय बहादुर की ख्याति

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10- डॉ. डिंपल दहिया, प्राचार्य, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय भालौठ।
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रोहित राठौर
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रोहतक। शहर से महज 10 किलोमीटर दूर बसा भालौठ गांव आज भी अपनी पुरानी विरासत और उन शख्सियतों के कारण चर्चा में रहता है जिन्होंने कानून से लेकर विज्ञान तक हर क्षेत्र में गांव का नाम ऊंचा किया। ब्रिटिश हुकूमत में चौधरी लालचंद फोगाट को राय बहादुर की उपाधि मिली। वहीं उनके बाद की पीढ़ी ने खेती और कारोबार में नई लकीर खींची।
राय बहादुर चौधरी लालचंद के पौत्र 74 वर्षीय दीपेंद्र सिंह फोगाट बताते हैं कि दादा राय बहादुर लालचंद फोगाट ने लाहौर और पंजाब हाईकोर्ट में वकालत की। उनकी काबिलियत को देखते हुए 1930 में अंग्रेज सरकार ने उन्हें राय बहादुर की उपाधि दी।
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कानूनी हलकों में उनका रुतबा इतना था कि वे दीनबंधु चौधरी छोटूराम से भी सीनियर वकील माने जाते थे लेकिन छोटूराम और लाल चंद साथ ही रहे हैं। दीपेंद्र ने बताया कि उनके बेटे रघुवेंद्र फोगाट ने आगे चलकर कॉरपोरेट दुनिया में कदम रखा और देश की नामी रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई।
विज्ञान के क्षेत्र में भालौठ के डॉ. रामचंद्र फोगाट का नाम आदर से लिया जाता है। डॉ. रामचंद्र के बेटे नरेश पाल बताते हैं कि डाॅ. रामचंद्र ने शंकर बाजरे की उन्नत किस्म विकसित की जिससे सूखे इलाकों के किसानों को बड़ी राहत मिली।
डॉ. रामचंद्र हिसार कृषि विश्वविद्यालय समेत कई विश्वविद्यालयों में प्रवक्ता रहे और हजारों छात्रों को कृषि वैज्ञानिक बनाया। उनकी रिसर्च आज भी कृषि विभाग के लिए नजीर है। संवाद
हरलाल वाली भालौठ से जाना गया भालौठ गांव
भालौठ सिर्फ पढ़े-लिखे लोगों की धरती नहीं, बल्कि मेहमाननवाजी की मिसाल भी है। गांव के सेवक हरलाल अपने अतिथि सत्कार के लिए इतने मशहूर थे कि उत्तर प्रदेश व अन्य राज्यों के लोग भालौठ को हरलाल वाली भालौठ के नाम से पुकारते थे। हर जाति-धर्म के लोगों का वे एक समान सम्मान करते थे। चौधरी हरलाल के प्रपौत्र प्रदीप फोगाट ने भावुक होकर बताया कि दादा की पहचान से हमारी पहचान बनना बड़ी बात है। गांव में एक बैठक होती थी जहां हर कोई कुछ न कुछ खाने का सामान रख जाता था। वह खुद भी गांव में भोजन इकट्ठा करते थे ताकि कोई भी गांव में आए वह भूखा न जाए।
महाराज देसनाथ की तपोस्थली भी रहा है भालौठ
रामचंद्र फोगाट बताते हैं कि गांव में महाराज जमनादास से पहले गांव में महाराज देसनाथ ने तपस्या की है। महाराज देसनाथ की माता दरवाजा स्थित प्रतिमा भी स्थापित की गई है। वहीं, महाराज जमनादास मंदिर समिति एवं धर्मार्थ ट्रस्ट के महासचिव जगदीश कुमार फोगाट बताते हैं कि महाराज जमनादास मंदिर में अंखड ज्योत जलती है। महाराज जमनादास की पुण्यतिथि पर सालाना मेला और विशाल दंगल होता है।
उत्तर प्रदेश में आज भी दादा हरलाल का जिक्र अवश्य होता है। उनकी दूसरों के प्रति सेवा भावना को हर कोई याद करता है। गांव में आया कोई महमान भूखा नहीं जाता था। -प्रदीप फोगाट, हरलाल के प्रपोत्र।

पिता डॉ. रामचंद्र फोगाट काफी बुद्धिमान होते थे। फसलों की काफी किस्मों पर उन्होंने काम किया। लायलपुर से उन्होंने एमएससी की। तीन स्कॉलर्स से उन्होंने पढ़ाई पूरी की। -नरेश पाल फोगाट, वैज्ञानिक डॉ. रामचंद्र के पुत्र
गांव में चौधरी लालचंद के बारे में सुनते आ रहे हैं। चौधरी लालचंद ब्रिटिश सरकार में वकालत करते थे। वह काफी सुलझे हुए इंसान थे। गांव में लिए भी खूब काम किया है। -सुरेश कुमार जांगड़ा, भालौठ।
गांव में लोग काफी सहयोगी हैं। देखने में आया है कि विद्यालय की बिल्डिंग को ग्रामीणों ने चंदा देकर तैयार किया था। गांव के लोग काफी शिक्षित हैं और पहले भी काफी नाम रहा है। -डॉ. डिंपल दहिया, प्राचार्य, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय भालौठ।
चौधरी हरलाल गांव में आने-जाने वाले हर व्यक्ति को रोटी खिलाते थे। खास बात यह भी है कि उनके नाम से ही हरलाल वाली भालौठ को जाना जाता था। -सुरेंद्र सिंह, भालौठ।
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10- डॉ. डिंपल दहिया, प्राचार्य, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय भालौठ।

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10- डॉ. डिंपल दहिया, प्राचार्य, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय भालौठ।

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10- डॉ. डिंपल दहिया, प्राचार्य, राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय भालौठ।

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