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Rohtak News: सेनानियों की भूमि किलोई...कण-कण में जल रही देशभक्ति की लौ

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10-अजय, किलोई।
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रोहित राठौर
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रोहतक। वीर सपूतों और स्वतंत्रता सेनानियों की भूमि रहे किलोई गांव की माटी ने न केवल अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोहा लिया बल्कि देश की आजादी के बाद सीमाओं की सुरक्षा में सर्वोच्च बलिदान देने से भी पीछे नहीं हटी। किलोई गांव के कण-कण में देशभक्ति की लौ जल रही है। गांव में करीब 1500 सैनिक परिवार हैं। फिलहाल 1200 युवा तीनों सेनाओं में तैनात हैं।
गांव के सपूत साधुराम ने 1999 के कारगिल युद्ध में दुश्मन के छक्के छुड़ाते हुए शहादत दी थी। बेटे बलवान बताते हैं कि पिता ने सिपाही पद पर रहकर 31 दिसंबर 1999 में देश के लिए बलिदान हुए थे। 2 जनवरी 2000 को राजकीय सम्मान के साथ गांव में पार्थिव शरीर पहुंचा था।
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वहीं, 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में गांव के कैप्टन रामकिशन ने अदम्य साहस दिखाते हुए रणक्षेत्र में जौहर दिखाया था। उनके पराक्रम ने दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। इसके लिए सेना से उन्हें मेडल भी मिला था।
वह 1994 में सेवानिवृत्त होकर घर लौटे थे। अंग्रेजों के शासनकाल में गांव के ही श्रीराम तहसीलदार के पद रहे थे। संवाद

सुभाष चंद्र बोस की सेना में रहे दीवान सिंह -फोटो : 05
किलोई खास निवासी जयसिंह ने बताया कि उनके पिता दीवान सिंह सुभाष चंद्र बोस की सेना आजाद हिंद फाैज में रहे थे। देश की आजादी और संघर्ष में उनका साथ निभाया था।
उन्होंने जापान की सहायता से अग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।
इस दौरान करीब सात साल तक पह घर नहीं लौटे थे। गांव वालों को लगा था कि उनका निधन हो गया। क्षेत्र के प्रशासनिक अधिकारी व डीसी भी सांत्वना और आर्थिक सहायता देने के लिए गांव में पहुंच गए थे। दीवान से पिता ज्ञानी राम ने बेटे को सही सलाम लाने की गुहार लगाई थी। हालांकि, करीब सात बाद दीवान सुरक्षित घर लौटे आए थे। उनको सुभाष चंद्र बोस की सेना के मेडल भी मिले हैं।

फोटो : 06

किलोई में 1500 से अधिक सैनिक परिवार और उनके परिजन हैं। पिता करतार सिंह भी 1971 की लड़ाई में अपना योगदान दे चुके हैं। उन्होंने आर्मी में रहकर देश सेवा की है। गांव के लड़कियों वाले स्कूल का नाम भी शहीद के नाम पर रखा गया है।

- विजय कुमार, सरपंच किलोई खास

फोटो : 07
मेरे भाई शहीद नायक साधुराम ने 1988 में सेना जॉइन की थी। दिसंबर 1999 में कारगिल युद्ध में वह शहीद हो गए थे। परिवार से भाई के अलावा कोई सैनिक नहीं है।
- बलवान, किलोई
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फोटो : 08
पति रामकिशन ने 1994 तक सेना में कैप्टन के रूप में सेवाएं दीं। सेना में रहते हुए कभी डरे नहीं बल्कि गर्व महसूस करते थे कि वह देश की रक्षा के लिए सीमा पर तैनात हैं। 1971 की लड़ाई में उन्होंने अपना योगदान दिया था।
- शांति, किलोई।
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फोटो : 09
पिता दीवान सिंह स्वतंत्रता सेनानी रहे हैं। सुभाष चंद्र बोस के साथ भी आजाद हिंद फौज में रहे हैं। एक समय ऐसा था कि वो सात साल बाद घर लौट पाए थे। लोगों को लगा कि उनका निधन हो गया लेकिन ऐसा नहीं था।
- जयसिंह, किलोई।
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फोटो : 10
मैंने दादा जी को अपनी चार साल की उम्र तक ही देखा था। पिता अशोक बताया करते हैं कि दादा रामकिशन सेना में कैप्टन रहे। उन्होंने सेनाओं का प्रतिनिधित्व किया था।


- अजय, किलोई।

फोटो : 11
मेरे दादा श्रीराम ब्रिटिश काल में तहसीलदार रहे हैं। गांव में दादा सबसे पहले तहसीलदार माने जाते हैं। उन्होंने पहले उत्तर प्रदेश में भी सेवाएं दीं, बाद में रोहतक में भी काम किया था।
- धर्मबीर हुड्डा, किलोई

फोटो 12
किलोई गांव शुरू से ही वीरों की धरती रहा है। अभी भी खेलों के माध्यम से काफी युवा आर्मी में शामिल हैं। शहीद नफे सिंह राठी जैसे वीरों को गांव हमेशा याद करता है।
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- सुभाष चंद्र, किलोई।

10-अजय, किलोई।

10-अजय, किलोई।

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10-अजय, किलोई।

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