जिले के अस्पतालों का हाल बेहाल है। चिकित्सकों की कमी और मरीजों की भीड़ के चलते यहां समस्याएं अपार हैं। सामान्य अस्पताल की ओपीडी के हालात पर नजर डालें तो एक डॉक्टर पर 150 मरीजों की जांच करने का भार रहता है। कुछ यही हाल दूसरे विभागों का है। इस पर भी डॉक्टरों के जिम्मे कई काम हैं। इनमें इमरजेंसी, पोस्टमार्टम, कोरोना ड्यूटी, कोर्ट केस, स्वास्थ्य शिविर व कार्यालय संबंधी कार्य मुख्य हैं। यही कारण है कि वर्कलोड से आहत डॉक्टर नौकरी छोड़कर निजी संस्थानों में जा रहे हैं। जिले में इस वर्ष अब तक 9 चिकित्सक अपना इस्तीफा दे चुके हैं। ऐसे में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पा रही है। अमर उजाला ने डॉक्टर्स-डे पर अस्पतालों की पड़ताल की तो यह सच सामने आया है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में चिकित्सकों के 139 पद स्वीकृत हैं। इनमें से 114 ही मरीजों की सेहत संभालने में जुटे हैं। वहीं, अन्य काम का भी इन्हीं के जिम्मे है। जिले में इस वर्ष अब तक चार स्पेशलिस्ट समेत 9 चिकित्सक अपना त्याग पत्र दे चुके हैं, जबकि छह पद पहले से रिक्त हैं। इसके अलावा आठ चिकित्सक स्नातकोत्तर डिग्री के लिए पीजीआई में अध्ययनरत हैं। उधर, दो एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी लीव पर हैं। ऐसे में डॉक्टरों पर वर्कलोड बढ़ना स्वाभाविक है। इसके विपरीत वेतन निजी क्षेत्र के मुकाबले कम है। इस कारण डॉक्टर नौकरी छोड़कर निजी संस्थानों में जा रहे है।
तीसरी लहर से पहले पुख्ता व्यवस्था का दावा
महामारी की तीसरी लहर की आशंका जताई जा रही है। इसे लेकर सरकार बड़े-बड़े दावे कर रही है। इसके तहत चिकित्सकों व नर्सों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। आक्सीजन प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं। वेंटिलेटर की व्यवस्था की जा रही है, जबकि इन्हें प्रयोग करने वाले कर्मचारी सीमित संख्या में हैं। समय रहते जरूरी संसाधनों की कमी पूरी करने की आवश्यकता है।
स्वास्थ्य विभाग मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करा रहा है। मौजूदा संसाधनों के तहत व्यवस्था बनाई जा रही है। जिला अस्पताल में मरीजों के लिए सभी तरह की सुविधाएं मुहैया है। सीएचसी-पीएचसी पर भी मरीजों को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाया जा रहा है। महामारी की तीसरी लहर से निपटने के लिए भी बेहतर प्रयास जारी हैं। इसके तहत आक्सीजन प्लांट लगाने का काम जोरों से चल रहा है। -डॉ. अनिल बिरला, सिविल सर्जन।