रोहतक। हीमोफिलिया एक अनुवांशिक बीमारी है, इसमें ए व बी ग्रुप की पहचान होना जरूरी है। इसी पहचान के आधार पर मरीज का उपचार संभव होता है। रक्त में फेक्टर आठ व नौ के कम बननेे या बिल्कुल न बनने पर समस्या होने लगती है। इससे प्रभावित मरीज के जोड़ों व मांसपेशियों में रक्तस्राव होने लगता है। कुछ मामलों में बगैर चोट लगे भी रक्तस्राव होने लगता है। ऐसी स्थिति में मरीज के ग्रुप के हिसाब से फेक्टर देना अनिवार्य हो जाता है। यह जानकारी पीजीआईएमएस में हीमोफिलिया केयर सेंटर चला रहे डॉ. सुधीर अत्री ने दी। वे रविवार को पीजीआईएमएस में आयोजित इन्हिबिटर स्क्रीनिंग कैंप एवं जागरूकता अभियान कार्यक्रम में कही।
डॉ. अत्री ने बताया कि बच्चे के जन्म लेने के पांच से छह माह तक इस बीमारी का पता ही नहीं चल पाता। जब पता चलता है तो उपचार शुरू किया जाता है। इसमें ध्यान देना होता है कि माता-पिता में यह बीमारी है या नहीं। इसके लक्षण में मुख्य रूप से जोड़ों में सूजन, रक्तस्राव का न रुकना शामिल होता है। प्रदेश सरकार भी इस बीमारी के लिए सालाना पांच से 6 करोड़ रुपये खर्च करती है। संस्थान में प्रदेश भर से 300 के करीब मरीज उपचार करवाने आते हैं। मरीज की जांच में उसका फेक्टर जांचा जाता है कि उसे किस ग्रुप की समस्या है। संस्थान में इसके लिए स्पेशल एचडीसीसी ओपीडी चलाई जाती है और इसके मरीजों के लिए पांच बेड निर्धारित हैं। यहां मरीज की जांच के आधार पर उससे संबंधित फेक्टर दे दिया जाता है और उसे छुट्टी दे दी जाती है।
एक्सपर्ट ने बताया कि हीमोफिलिया माइल्ड, मोडरेट व सीवियर तीन रूपों में पाया जाने वाला गंभीर रोग है, लेकिन समय पर पहचान, उपचार और जागरूकता से निपटा जा सकता है। माइल्ड हीमोफिलिया का पता सर्जरी या गंभीर चोट लगने पर होता है। जबकि अन्य दो की पहचान बाद में होती है।
ये होते हैं फेक्टर और बाजार में इनकी कीमत
फेक्टर सात : 37000 रुपये वन मिलीग्राम
फेक्टर नौ : 9000 रुपये ग्रुप बी
फेक्टर आठ : 3500 रुपये ग्रुप ए
नोट : मरीज की जांच के बाद इन फेक्टरों की डोज निशुल्क दी जाती है। ध्यान देने योग्य है कि ए ग्रुप के 80 फीसदी मरीज होते हैं तो बी ग्रुप के 20 फीसदी इसके मरीज होते हैं। इनके लक्षणों की आसानी से पहचान संभव नहीं होती, दोनों ग्रुप के लक्षण समान होते हैं। मरीज को पता होना जरूरी है कि वह किस ग्रुप का है। गलत फेक्टर लगने पर उसे नुकसान हो सकता है।
प्रभावित शादी से पहले खास ध्यान दें
- मेल में समस्या है और फीमेल में नहीं तो शादी के बाद होने वाले बच्चे में यह समस्या लड़कियों में मिलेगी
- मेल में नहीं है और फीमेल में यह समस्या है तो शादी के बाद होने वाले लड़कों में यह समस्या मिलेगी
उपाय
- गर्भ ठहरने पर जांच कराएं। इसके लिए क्रोनिक विलस बायोपसी व करिअर डिटेक्ट टेस्ट एम्स में होता है। यह आठ से 12 सप्ताह के गर्भ में ही करवाना अनिवार्य होता है।
इन्हिबिटर स्क्रीनिंग जांच होती है अहम
एक्सपर्ट बताते हैं कि हीमोफिलिया के रोगियों में कई बार फेक्टर भी काम नहीं करते। कई बार शरीर इन फेक्टरों के खिलाफ एंटी बाडी बना लेती है। इसकी जांच के लिए सीएमसी लुधियाना में सुविधा है। यदि इस जांच में मरीज पाजिटिव आता है तो उसका उपचार शुरू कर दिया जाता है। इसके लिए दवाएं उपलब्ध हैं। डॉ. अत्री की मानें तो विदेशों में इस बीमारी से ग्रस्त लोग फुटबाल, जिमभनास्टिक तक करते हैं। यह स्क्रीनिंग फिलहाल संस्थान में नहीं होती, लेकिन की जा सकती है। इसके अलावा इससे ग्रस्त कोई मरीज यदि ऐसे किसी एरिया में जाता है जहां उसे उपचार नहीं मिलेगा तो उसे सेल्फ इन्फयूजन तकनीक सिखाई जाती है। लुधियाना के एक एक्सपर्ट ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह स्क्रीनिंग ब्लड लेने के चार घंटे के अंदर होनी चाहिए। लेकिन निजी लैब यह बात नहीं बताती।
मरीजों की इन्हिबिटर स्क्रीनिंग जांच करने के लिए संस्थान के डॉक्टरों व स्टाफ की टीम को प्रशिक्षण के लिए बाहर भेजा जाएगा। इससे यह जांच संस्थान में हो सकेगी। इसके लिए अलग बजट भी नहीं चाहिए और हमारे पास इसके लिए सभी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
- डॉ. रोहतास कंवर यादव, कार्यकारी कुलपति एवं निदेशक, पीजीआईएमएस