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पांच से दस प्रतिशत रोजाना करवा रहे फर्जी सैंपलिंग

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कोरोना संक्रमणकाल में स्वास्थ्य विभाग के लिए फर्जी सैंपलिंग कराने वाले सिरदर्द बने हुए हैं। इनकी संख्या पांच से दस प्रतिशत है। संक्रमित मिलने के बाद इनकी दी गई जानकारी सही नहीं होती। स्वास्थ्य विभाग की टीम जब इनकी ट्रेसिंग करती है तो यह नहीं मिलते। ऐसे में विभाग की दुविधा बढ़ जाती है कि वह संक्रमितों की संख्या को कहां और किस श्रेणी में ले जाए।
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डिप्टी सिविल सर्जन एवं जिला नोडल अधिकारी कोविड-19 डॉ. राजबीर सभ्भरवाल ने बताया कि विभाग के लिए फर्जी सैंपल करवाने वाले लोग सिरदर्द बन गए हैं। जब इनकी रिपोर्ट संक्रमित मिलती है तो हम इनसे संपर्क करते हैं और यह नहीं मिलते। जब तक मरीज न मिले तब तक उसे संक्रमितों की लिस्ट में शामिल कर पाना मुश्किल होता है। यदि हम उन्हें लिस्ट में शामिल कर लें तो उनकी कांटेक्ट ट्रेसिंग कहां से करें। डॉ. राजबीर ने बताया कि कुछ लोग जानबूझ कर गलत नाम, पता, फोन नंबर के साथ सैंपल देकर आते हैं। ये लोग अपने साथ विभाग का और समाज का नुकसान कर रहे हैं।
पंजीकरण करते समय करनी होगी सख्ती
फर्जी सैंपलिंग से बचने के लिए स्वास्थ्य विभाग को पंजीकरण के समय सख्ती करनी होगी। यहीं पर सैंपल करवाने वाले की आईडी लेनी अनिवार्य करने से ही समस्या का समाधान हो पाएगा। विभाग की यहां मजबूरी है कि वह अधिक सैंपल लेने के चक्कर में कागजी कार्रवाई पूरी नहीं कर पाता, जिसका खामियाजा उसे बाद में उठाना पड़ता है।
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संक्रमितों से संपर्क करने के बाद ही सार्वजनिक होती है लिस्ट
कोविड-19 के जिला नोडल अधिकारी ने बताया कि संक्रमितों से संपर्क करने के बाद ही लिस्ट जारी की जाती है। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग लगातार इनके संपर्क में रहता है।
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