रोहतक। यह उन दिनों की बात है, जब मैं चार साल की थी। मेरी मां बीमारी के कारण चल बसी। पिता सत्यराम गुप्ता पीडब्लूडी में बेलदार थे। उन्होंने ही हम तीन भाई-बहनों को पाला। मुझसे बड़ी मेरी बहन रेणु है। एक छोटा भाई है सूरज। हमें नहलाना, स्कूल के लिए तैयार करना, कपड़े धोना, खाना बनाना सब काम वे खुद करते थे।
हम भी हर साल फादर्स डे पर उनके लिए गिफ्ट लाते थे। उसे देखकर वे बड़े खुश होते थे। दुर्भाग्य से अब वे हमारे बीच नहीं हैं। वे गंभीर रूप से बीमार थे। उन्हें लखनऊ पीजीआई में भी जगह नहीं मिली थी। अब वे होते तो हम फादर्स-डे जरूर मनाते। हमें उनकी कमी खल रही है। यह दर्द है समाजसेवा में जुटी एमएसडब्लू (मास्टर इन सोशल वर्क) की छात्रा सोनिया का। अमर उजाला से फादर्स-डे पर हुई बातचीत में छात्रा ने अपना दर्द साझा किया।
शहर के शीतल नगर में रहने वाली सोनिया ने बताया कि मां के गुजरने के बाद पिता ने हमें पाला। फिर हमारी समस्याओं व भविष्य को देखते हुए मां के निधन के छह साल बाद पिता ने दूसरी शादी की। मां ने भी हमें कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वे दूसरी हैं। हम सब मिलकर फादर्स व मदर्स डे मनाते रहे। पिता नहीं हैं, इसलिए फादर्स-डे पर हमारी आंखें नम हैं। इस बार मां ने भी मदर्स डे नहीं मनाया। हम भाई-बहनों ने उनके लिए केक बनाया, मगर वे उसे अपने हाथों से काट ही नहीं पाई, फफक पड़ी। पिता हमारे बड़े होने तक सभी काम करते थे। वे कहते थे, अभी तो मैं कर रहा हूं। बाद में कौन करेगा। वे हमें इस तरह छोड़कर चले जाएंगे, हमें पता नहीं था। छोटे भाई की शादी के लिए वे गांव में मकान बनवाने गए थे। वहां से डेढ़ महीने में आना था। हमें नहीं पता था कि वे अब कभी नहीं आएंगे।
एमटीएफसी संस्था से जुड़ी है सोनिया
सोनिया ने कहा कि वह एमटीएफसी संस्था से जुड़ी है। संस्था के साथ काम करते हुए जरूरतमंदों की मदद, बच्चों को पढ़ाना व समाजसेवा से जुड़े काम कर रही हूं। एसएससी कंप्यूटर साइंस से करने के बाद अब एमएसडब्लू की पढ़ाई कर रही है। संस्था निदेशक नरेश ढल ने भी पिता की तरह हमारा सहयोग किया। पिता का इलाज कराना, उन्हें गंभीर हालत में लखनऊ से रोहतक लाना या हमें प्रोत्साहित करना, हर तरह वे हमारे साथ खड़े रहे।
काश 30 मिनट और पिता के साथ रहता...
: किडनी की समस्या से पीड़ित थे सुभाष ढल
एमटीएफसी संस्था के निदेशक नरेश ढल को पिता से अलग रहने के 30 मिनट अब भी खलते हैं। इन 30 मिनट में किडनी मरीज पिता की हालत बिगड़ी और वे हमेशा के लिए हमारा साथ छोड़ गए। काश! उस दिन मैं 30 मिनट और पिता सुभाष ढल के साथ रहता। वहां रहता तो शायद उन्हें बचा लेता। यह टीस बार-बार परेशान करती है। यह कहना है एमटीएफसी संस्था के निदेशक नरेश ढल का। वे फादर्स-डे पर अमर उजाला से अपना दर्द साझा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि माता-पिता साथ होते हैं तो किसी तरह की कमी या डर नहीं रहता है। वे हर जिम्मेदारी खुद निर्वहन करते हैं। यह उनके जाने के बाद पता लगा। अब भी उनकी आवाज कानों में गूंजती है। बढ़ती उम्र में खुद को बच्चा होने का अहसास माता-पिता ही कराते हैं। उनके नहीं होने से अकेलापन महसूस होता है। उन्होंने कहा कि मेरे पिता किडनी मरीज थे। उनका इलाज चल रहा था। पहली बार किसी निजी अस्पताल में ले गया था। यहां सात दिन भर्ती रहे। इस दौरान मैं वहां सिपाही की तरह खड़ा रहा। उनकी हालत सामान्य थी। इसलिए उस दिन मैं घर आ गया। थका होने व नींद आने के कारण अपना मोबाइल साइलेंट कर सो गया। पत्नी ने फोन किए, मगर पता नहीं लगा। बाद में दोस्त घर आया तो पिता की हालत बिगड़ने का पता लगा। अस्पताल पहुंचा, तब तक देर हो चुकी थी। अब वे 30 मिनट मुझे खलते हैं। इसलिए कोरोना काल में अपना मोबाइल ऑन रखा। जहां से भी किसी ने मदद की गुहार लगाई, वहां मदद पहुंचाई। अब यही आदत बना ली है।