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डिजिटल डेवलपमेंट प्लान : सेटेलाइट से जुड़ेगा शहर का हर एक हिस्सा

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डिजिटल डेवलपमेंट प्लान के तहत शहर के भौगोलिक ढांचे को सेटेलाइट से जोड़ा जाएगा। जिसके लिए हर स्थान की जियो टैगिंग की जाएगी। जियो टैगिंग के बाद ही 2041 में बनने वाले आगामी विकास कार्योें की रूप रेखा तैयार होगी। इस बारे में नए साल पर बुधवार को उपायुक्त कार्यालय में डेवलपमेंट प्लान को लेकर अधिकारियों की बैठक हुई। जिसमें सभी अधिकारियों को 31 मार्च तक शहर की भौगोलिक परिस्थितियों की फाइल तैयार कर जमा कराने की जिम्मेदारी दी गई है। जियो टैगिंग में लोंगिट्यूड-एप्टीट्यूड के हिसाब से जमीन का पैमाइश की जाएगी। इससे सेटेलाइट पर संबंधित स्थान की सटीक जानकारी मौजूद रहेगी। सेटेलाइट से हर गली की चौड़ाई से लेकर बिजली के पोल तक की लोकेशन व डिटेल मिल सकेगी। नगर निगम के सीनियर टाउन प्लानर केके वार्ष्णेय ने बताया कि इसके लिए 31 मार्च तक सभी विभाग अपना डाटा तैयार करेंगे।
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बुधवार को उपायुक्त ने सभी विभागों के अधिकारियों की बैठक ली। उपायुक्त आरएस वर्मा ने कहा कि नगर का 2041 डेवलपमेंट प्लान पूर्ण रूप से जियोटैग्ड होगा और सेटेलाइट इमेज के आधार पर बनाया जाएगा। 2041 का रफ डेवलपमेंट प्लान तैयार किया जा चुका है और इस प्लान को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया लगातार जारी है। उपायुक्त ने कहा कि संबंधित विभागों को उनके मौजूदा इंफ्रास्ट्रेक्चर व प्रस्तावित इंफ्रास्ट्रक्चर को चिह्नित करके जांच के लिए सौंप दिया गया है ताकि इस विषय पर आगामी कार्य किया जा सके। डेवलपमेंट प्लान एकदम विशुद्ध व सटीक होगा। डेवलपमेंट प्लान में मौजूदा स्थिति को दर्शाने के अलावा यह भी दर्शाया जाएगा कि वर्ष 2041 में बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुसार कौन - कौन सी चीजें प्रस्तावित हो सकती है।
सड़कों, नहरों, पुल सहित हर चीज को सेटेलाइट से जोड़ा जाएगा
डिजिटल डेवलपमेंट प्लान में रोहतक नगर निगम क्षेत्र के साथ-साथ 5 किलोमीटर तक का क्षेत्र इसमें लिया जाएगा। इसमें सीवर की लंबाई - चौड़ाई से लेकर ढक्कन तक, पेयजल कनेक्शन, पुलिस थाना, कौन सी सड़क कब बनी थी, कितनी लागत आई, कितनी लंबाई है, कितनी चौड़ी है, कहां शौचालय है, किस जगह कितनी जमीन खाली है, कितनी पर मकान, फैक्टरी हैं। इस तरह की तमाम छोटी से बड़ी जानकारी सेटेलाइट से जोड़ी जाएगी। इसमें पब्लिक के साथ-साथ अधिकारियों को भी आगे की प्लानिंग करने में आसानी रहेगी।
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यह है जियो टैगिंग
जियो टैंगिग में भौगोलिक क्षेत्र के फोटो के साथ उसके बारे में पूरी जानकारी इंटरनेट पर उपलब्ध कराया जाता है। कौन सा स्थान कहां है, क्या उसकी भौगोलिक स्थिति है। जियो टैग में जमीनों की रजिस्ट्री तक की जानकारी को ऑनलाइन किया जा सकता है। किसी चालू परियोजना में भी इसे प्रयोग में लाया जा सकता है। इसमें कार्य की प्रगति की रोजाना रिपोर्ट एक फोटो के साथ अपडेट कर किसी निश्चित पोर्टल या एप पर अपलोड की जाती है। इससे कार्य के नाम पर होने वाली गड़बड़ी की आशंका बेहद कम रहती है। जियो टैगिंग में कार्य का पूरा ब्योरा दिया जाता है।
यह होगा फायदा
अगर सार्वजनिक स्थानों की जियो टैगिंग की गई है तो कोई भी अजनबी शहर में सार्वजनिक और सामुदायिक धर्मशाला, चौपाल, रैनबसेरों, रेस्ट हाउस, शौचालय, रेलवे स्टेशन सहित अन्य लोकेशन की जानकरी ले सकेगा। शहर में सरकारी स्थलों व संपत्तियों की जियो टैगिंग से तबादला होकर आए अधिकारियों को अपने विभाग की जमीन, उसकी भौगोलिक जानकारी का आसानी से पता चल जाएगा। उदाहरण के लिए नगर निगम को पता होगा की उनकी सड़क कहां तक है, कहां तक उनका कार्य क्षेत्र है। ये सब जियो टैगिंग से जानना आसान हो जाता है। सीवर कहां से कहां बिछा हुआ है, कहां पर उसका ढक्कन है, ये सब जानकारी अधिकारी इंटरनेट से मिल सकेगी।
डिजिटल डेवलपमेंट तैयार किया जा रहा है। इसमें सबसे पहले पूरे शहर के भौगोलिक ढांचे को सेटेलाइट से जोड़ा जाएगा। इसके लिए 31 मार्च तक सभी विभाग अपना डाटा तैयार करेंगे। इसके बाद सेटेलाइट से डाटा जोड़ने की प्रक्रिया चलेगी। इससे अधिकारी इंटरनेट से ही पूरे शहर के भौगोलिक क्षेत्र को जानकर उसके आधार पर आगे के विकास कार्यों की परियोजनाएं बना सकेंगे।
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- केके वार्ष्णेय, नगर निगम सीनियर टाउन प्लानर
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