नागरिक अस्पताल में जांच के लिए पहुंचा युवा।
बहादुरगढ़। एक सीमा से अधिक शोरगुल होने पर लोगों के स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ता है। तेज आवाज में डीजे बजाने, लंबे समय तक ईयर फोन पर तेज आवाज में गााने सुनने से लोगों की सुनने की क्षमता प्रभावित हो रही है। सरकारी अस्पताल की ईएनटी विभाग की ओपीडी में रोज तीन से चार मरीज इस समस्या को लेकर पहुंच रहे हैं। इनमें 20 से 35 साल के युवा अधिक हैं। इनके कान की नसें कमजोर हो रही हैं। सुनने की क्षमता कम हो रही है।
हर साल 27 अप्रैल को अंतरराष्ट्रीय शोर जागरूकता दिवस मनाया जाता है। इसे लोगों को शोरगुल न करने और उससे होने वाले नुकसान और बचाव के बारे में जानकारी दी जाती है। नागरिक अस्पताल में प्रतिदिन 60 से 70 मरीज कान चैक कराने के लिए पहुंचते हैं। इनमें से तीन-चार मरीज ऐसे होते हैं जिन्हें सुनने की क्षमता कम हो रही है। यह कोई उम्र दराज नहीं होते, बल्कि 20 से 35 साल के युवा होते हैं। इन मरीजों को कम सुनने की शिकायत मिलती है। जांच में पाया गया कि शहरी क्षेत्र में वाहनों के शोर के अलावा अधिक समय तक घरों में टीवी से चिपके रहने, ईयर फोन लगाकर घंटों गाने सुनने या फोन पर बात करने से बहरापन पनप रहा है। नागरिक अस्पताल के ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. चंद्रशेखर ने लोगों को ध्वनि प्रदूषण से बचने की हिदायत दी है।
स्वास्थ्य के लिए हानिकारक
50 डेसिबल ध्वनि स्तर का कानों पर असर नहीं पड़ता, लेकिन यदि ध्वनि स्तर 80 डेसिबल हो जाता है तो वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लगातार शोर-शराबे के बीच रहने से काम को नुकसान पहुंचता है। इससे सुनने की क्षमता घटने लगती है। लगातार शोर से संवेदी तंत्रिका को नुकसान हो सकता है।
-डॉ. चंद्रशेखर, ईएनटी विशेषज्ञ, नागरिक अस्पताल बहादुरगढ़।