मेरा गांव मेरी शान
रोहित राठौर
रोहतक। सांपला तहसील से 8.7 किलोमीटर दूर 800 साल पुराना इतिहास समेटे हुए पाकस्मा गांव आज भी भाईचारे के लिए जाना जाता है। दादा महेंद्रा ने दिल्ली के उजबा से आकर यह गांव बसाया था। यहां 14 राणा गोत्र से उनकी पहचान हुई और उन्होंने इस धरती को अपनी कर्म भूमि बनाया।
ग्रामीण ज्ञान सिंह बताते हैं कि वर्ष 1100 से 1300 के बीच में गांव की स्थापना मानी जाती है। तब से दादा महेंद्रा के नाम से गांव की पहचान है। दादा महेंद्रा की तीन संतानें थीं। उन्हीं के नाम पर गांव खदराण, पुलाण और सैढ़ाण में पाने बने।
बताते हैं कि 1700 के के बाद गांव का नामकरण भागौलिक, जातीय व संघीय स्थिति से लिखित रूप में पाकस्मा से हुआ था। गांव का नाम ‘पाक+समां’ यानी पवित्र धरती से जुड़ा है। मान्यता है कि इस पवित्र धरती पर आज तक कोई बड़ी अप्रिय घटना नहीं हुई।
ग्रामीण दिलजीत ने बताया कि पाकस्मा में सभी समुदायों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। हालांकि, यह जाट बाहुल्य गांव है। बताते हैं कि महेंद्रा ने 14 लड़ाइयां लड़ी और लड़ाईयों में जीत हासिल की। इस कारण गांव में 14 राणा गोत्र काे जाना गया।
आपसी भाईचारे के चलते यहां कभी जातीय या सांप्रदायिक तनाव नहीं देखा गया। खेती यहां का मुख्य व्यवसाय है। नए दौर में भी गांव अपनी परंपराओं से जुड़ा है। स्कूल, चौपाल और मंदिर गांव की पहचान हैं। पाकस्मा के भाईचारे की आज भी मिसाल है। संवाद
पाकस्मा से भी सात गांवों की हुई निकासी
फोटो : 19
ग्रामीण यशवंत ने बताया कि दादा महेंद्रा के गांव बसाने के बाद यहां के लोगों ने और गांव भी बसाए हैं। पाकस्मा से सात गांवों की निकासी हुई है। इसमें उत्तर प्रदेश के लोहारा, ककोर व दुर्गापुर, हरियाणा के मोई, माजरी व कसरैंटी, दिल्ली का घेवरा गांव शामिल हैं। वहीं, पंडित लख्मी वत्स के लगाए नीम के पेड़ की चर्चा काफी रही। लोखरी जोहड़ पर लगे नीम के पेड़ पर कोई व्यक्ति नहीं चढ़ पाया था। वह शाही नीम का वृक्ष पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध था।
गांव एक नजर में
- 12,000 से अधिक आबादी
- 55,00 से अधिक मतदाता
- तीन विद्यालय (राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक, कन्या वरिष्ठ माध्यमिक व प्राथमिक विद्यालय)
- एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व सब सेंटर
- पांच मंदिर (बाबा रामदास, बाबा मांगे नाथ, शिवालय, बाबा हरिदास व काली माता का मंदिर)
- सात सार्वजनिक चौपालें
- पांच जोहड़ (तला, बिस्ताली, डोभा, फिरा व लोखरी)
फोटो : 20
उर्दू भाषा के स्तंभकार ने गांव का नाम पाक और समां या आसमां शब्दों से रखा था। गांव की स्थापना से लेकर अब तक कोई अप्रिय घटना नहीं घटी। अपनी अस्मिता को बचाने के लिए गांव का नाम पाकस्मा रखा था।
- कंवल राणा, डीआरएक्स एवं सामाजिक कार्यकर्ता
फोटो : 21
गांव में सभी जाती के लोग रहते हैं। बताते हैं कि गांव में पुराना नीम का वृक्ष होता था, उस पर कोई चोटी तक नहीं चढ़ सका था। हालांकि, अब टूटने के बाद पेड़ नहीं बचा है।
- धर्मबीर उर्फ धर्म, ग्रामीण
-
फोटो : 22
दादा महेंद्र का बसाया गया गांव अब तक खुशहाल है। गांव के पानों में से सबसे बड़ा पाना खदराण है। गांव में सबसे पुराना और बड़ा जोहड़ तला है।
- महेंद्र, ग्रामीण
-
फोटो : 23
बताते हैं कि पहले बाबा रामदास पूजा करते थे। तब दादा महेंद्रा गांव में पहुंचे थे। गांव की स्थापना और रिहायश प्रशासनिक गौरव पट्ट के अनुसार वर्ष 1600 में कही जाती है।
- बल्लू, ग्रामीण
17-सांपला कस्बे के पाकस्मा में बना प्रवेश द्वार। संवाद
17-सांपला कस्बे के पाकस्मा में बना प्रवेश द्वार। संवाद
17-सांपला कस्बे के पाकस्मा में बना प्रवेश द्वार। संवाद
17-सांपला कस्बे के पाकस्मा में बना प्रवेश द्वार। संवाद
17-सांपला कस्बे के पाकस्मा में बना प्रवेश द्वार। संवाद
17-सांपला कस्बे के पाकस्मा में बना प्रवेश द्वार। संवाद
17-सांपला कस्बे के पाकस्मा में बना प्रवेश द्वार। संवाद