पीजीआईएमएस के आपात विभाग में इलाज कराने आ रहे हैं तो अपनी जेब में दवा खरीदने के लिए पैसे लेकर आएं। आपात कालीन विभाग में इन दिनों सामान्य ही नहीं जीवन रक्षक दवाएं भी नहीं हैं। एंटी बायोटिक से लेकर सिरिंज, दर्द निवारक, घाव धोने और घाव पर लगाने तक की दवा नहीं है। विभाग ने 24 दवाओं की डिमांड कर रखी है, लेकिन उनकी आपूर्ति नहीं हो पा रही है।
ऐेसे में इलाज के लिए आने वाले मरीजों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। हादसे में घायल होकर आने वाले गंभीर मरीजों की तो जान पर बन जा रही है। कई बार ऐसे लोगों के साथ कोई परिजन नहीं होता। ऐसे में बाहर से भी दवा नहीं खरीदी जा सकती। अस्पताल में दवाओं की कमी कई दिनों से बनी है, लेकिन उनकी व्यवस्था नहीं हो पा रही है। जिनके पास पैसे नहीं होते हैं उनका इलाज तक बंद हो गया है।
आपातकालीन विभाग को पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (पीजीआईएमएस) का चेहरा और दिल कहा जाता है। फिलहाल, यह विभाग खुद ही गंभीर स्थिति में है। तीन दिसंबर से दवाओं की लोकल खरीद रुकने से अब विभाग में दवाएं नहीं हैं। खरीद रुकने से पहले विभाग में जो दवाएं आ रही थीं उनके रेट कांट्रेक्ट में गड़बड़ी का मामला सामने आया था। स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज की ओर से आई जांच को संस्थान के ही तीन सीनियर अधिकारियों ने किया और गड़बड़ी की आशंका के चलते विजिलेंस जांच के लिए चंडीगढ़ भेज दिया।
इसमें बताया गया कि जो दवा बाजार में कम कीमत में उपलब्ध है, उसे अधिक कीमत पर खरीदा जा रहा है। सूत्रों की मानें तो एकाएक रोकी गई खरीद की मुख्य वजह जांच ही है। लेकिन बिना कोई इंतजाम किये अचानक दवा खरीद को बंद करने से मरीजों का जीवन खतरे में पड़ सकता है।
हादसों में घायलों को अधिक परेशानी
अकसर सड़क दुर्घटनाओं और मारपीट में घायल होने वाले गंभीर स्थिति में आपात विभाग में पहुंचते हैं। इनमें से कई अज्ञात के रूप में उपचार के लिए आते हैं। ऐसे में यदि इन्हें अस्पताल से दवा नहीं मिलती है तो इनकी जान को खतरा हो सकता है। परिजन नहीं होने के कारण बाहर से दवा नहीं आ पाती और इनकी जान पर बन जाती है। कई बार आर्थिक रूप से कमजोर मरीज भी उपचार के लिए संस्थान पहुंचते हैं। ऐसे मरीजों को भी यदि संस्थान से दवा नहीं मिलती है तो उनका इलाज नहीं हो पाता है। जबकि आपातकालीन विभाग में प्राथमिक उपचार निशुल्क उपलब्ध करवाना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन अधिकारियों की लापरवाही के चलते इस पर ग्रहण लगा हुआ है।
जेब से खरीद चुके हैं सामान
आपात कालीन विभाग के स्टाफ की मानें तो मरीजों की जरूरतों को देखते हुए 30 हजार रुपये से अधिक का सामान जेब से खरीदा गया है। इसके बिल पास होने में छह माह से अधिक का समय लग सकता है। स्टाफ और डॉक्टरों का कहना है कि वह अपनी जेब से अधिक दवा नहीं खरीद सकते हैं। यह समस्या लगातार चली आ रही है। इस संबंध में हर दिन रिमाइंडर भेजा जा रहा है, लेकिन जवाब नहीं आ रहा है। शनिवार को भी डॉक्टरों और स्टाफ नर्स ने 600 रुपये एकत्रित करके दवा का इंतजाम किया। इस दवा को टूट-फूट कर आए मरीजों के लिए प्रयोग किया जाता है।
सीएमओ की भी भारी कमी
आपातकालीन विभाग में सीएमओ की भी कमी चल रही है। आठ पोस्ट मंजूर है और जरूरत 12 सीएमओ की है, लेकिन कार्य केवल तीन सीएमओ कर रहे हैं। इनके पास कोर्ट ड्यूटी की भी जिम्मेदारी होती है। सूत्रों की मानें तो सीएमओ अपने कार्यों की जिम्मेदारी हाउस सर्जन को देकर चले जाते हैं, जोकि नियमानुसार गलत है। जिस सीएमओ के रिकार्ड में एमएलआर काटी जाती है, उसकी जिम्मेदारी उसी की होती है। डॉक्टरों की मानें तो इस मामले में कभी न कभी बड़ा पेंच फंसना तय है।
दवा की खिड़की रहती है खाली
आपातकालीन विभाग में आने वाले मरीजों के लिए कुलपति डॉ. ओपी कालरा ने निशुल्क दवा उपलब्ध कराने के लिए स्पेशल विंडो खुलवाई। लेकिन दवा की अनुपलब्धता के चलते इस खिड़की पर कोई मरीज दिखाई नहीं देता। मरीजों के परिजनों को छोटी से बड़ी दवाओं के लिए निजी दवा केंद्रों पर जाना पड़ता है।
24 दवाओं की भेजी है लिस्ट
डीएमएस आपातकालीन विभाग की ओर से चिकित्सा अधीक्षक, निदेशक और कुलपति के पास दवाओं की कमी को संज्ञान में लाया गया है। इसमें कई दवाएं जीवन रक्षक हैं। इसमें नवजात बच्चों की दवा के साथ ही हायपर टेंशन, घाव धोने, एसीडीटी, दर्द और घाव पर लगाने के लिए बीटाडिन तक शामिल हैं। इनके साथ ही एनटीजी, मैगनीशियम सल्फेट, टीटी के इंजेक्शन के अलावा टांके लगाने के लिए धागे तक नहीं हैं। विभाग में इन दिनों बहते रक्त को रोकने के लिए और रक्तवाहिकाओं की ब्लॉकेज खोलने के लिए भी इंजेक्शन नहीं हैं। एंटी बायोटिक दवा, कार्बन पेपर, सिरिंज जैसी चीजें विभाग में एकदम से निल हैं।
बोले अधिकारी
आपातकालीन विभाग में सभी दवाओं का होना बहुत जरूरी है। इस संबंध में चिकित्सा अधीक्षक से बात हुई है। उन्होंने कहा है कि स्टोर में दवाएं आ गई हैं। जो दवा रह गईं हैं उनकी खरीद जल्द होगी। मरीजों को कोई परेशानी नहीं होने दी जाएगी। इसके अलावा अन्य समस्याओं पर भी शीर्ष अधिकारियों से बात करेंगे।
- डॉ. प्रशांत, प्रोफेसर इंचार्ज, पीआर विभाग, पीजीआईएमएस