अमर उजाला एक्सक्लूसिव
पीजीआई के आपात विभाग ने चार साल में खरीदी एक करोड़ 94 लाख की लाइफ सेविंग मेडिसिन,
2016 में खरीदी सवा एक करोड़ की दवा
पीजीआईएमएस आपात विभाग का लोगो
संजय कुमार
रोहतक।
पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के आपात विभाग ने 2014 से 2017 तक चार साल में एक करोड़ 94 लाख रुपये से अधिक की लाइफ सेविंग मेडिसिन की खरीद की है। इसमें से एक करोड़ 21 लाख रुपये से अधिक की दवा अकेले 2016 में खरीदी गई। 2014 में 12 लाख 45 हजार 981 रुपये की दवा ही खरीदी गई। हैरानी इस बात की है कि 2016 में हुए जाट आरक्षण आंदोलन को लेकर आखिरकार विभाग ने कितनी दवाएं खरीद लीं कि वह समाप्त भी हो गईं और 2017 में फिर 36 लाख 32 हजार रुपये की दवा खरीदनी पड़ गई। जबकि इन चार वर्षों के दौरान यहां आने वाले मरीजों की संख्या औसतन साढे़ तीन लाख सालाना ही रही है।
सूबे के एक मात्र पीजीआईएमएस के आपात विभाग में दवाओं की खरीद का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। क्योंकि हर साल दवाओं की खरीद में कई गुना अंतर है। ऐसे में इन दवाओं की खरीद में शामिल अधिकारी और अकाउंट विभाग संदेह के दायरे में है। क्योंकि आपात विभाग में दवाओं की खरीद हमेशा विवादों में रही है। पहले विभाग में दवा की खरीद में रेट कॉन्ट्रेक्ट को लेकर विवाद रहा। इसकी जांच हुई तो सवाल उठाया गया कि बाजार में कम कीमत पर उपलब्ध दवाओं को अधिक कीमत में क्यों खरीदा गया। इसकी जांच हुई और इसे विजिलेंस जांच के लिए भेजा गया। इसके बाद यहां की दवाओं की खरीद के लिए फिर नए सिरे से रेट कॉन्ट्रेक्ट हुआ। इस पर भी विवाद चला आ रहा है। अब आपात विभाग में दवाओं की खरीद का जो ग्राफ सामने आया है वह सभी के होश उड़ा रहा है। विभाग में औसतन प्रतिदिन 1000 से 1200 मरीज ही उपचार के लिए आते हैं। इनकी संख्या में कोई खास बढ़ोतरी भी नहीं हुई है, लेकिन खरीदी गई दवा की कीमत में लाखों के अंतर ने सवाल खडे़ कर दिए हैं।
यह है नियम
संस्थान में हर साल सभी विभागों से उनकी जरूरत की दवाओं के बारे में पूछा जाता है, जिसे एक सिस्टम से खरीद कर सेंट्रल स्टोर में लाया जाता है। यहीं से दवा हर जगह सप्लाई होती है। आपात विभाग में लाइफ सेविंग दवाओं और मरीजों की जरूरतों को देखते हुए डेली खरीद का ऑप्शन है। अगर सेंट्रल स्टोर में दवाएं नहीं हैं तो इसे खरीदा जा सकता है। इसमें सीएमओ को 2000 रुपये की एक दवा प्रतिदिन के हिसाब से खरीदने की अनुमति है। हां यहां दवा की खरीद की कोई लिमिट नहीं है। हैरानी की बात है कि हाल ही में संस्थान ने पत्रकारवार्ता के दौरान यह दावा किया था कि उनके यहां दवाओं की कमी नहीं है। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में दवाओं की खरीद सवालों में है। हैरान करने वाली बात यह भी है कि एक विभागाध्यक्ष को एक साल में आपात स्थिति में दवा खरीदने का अधिकार एक लाख रुपये तक का ही है। इसके लिए वह स्वयं, अकाउंट व परचेज को साथ लेकर दवा खरीदता है जबकि आपात विभाग में हर माह लाखों रुपये की दवाओं की खरीद हो रही है।
वर्ष रुपये
2014 12,45,981.07
2015 24,13,166.00
2016 1,21,15,273.00
2017 36,32,241.00
2018 (31 मार्च तक) 1,18,376.00
बोले अधिकारी
मेरे संज्ञान में ऐसा कोई मामला नहीं है। अगर ऐसा कुछ सामने आता है तो जांच हो जाएगी।
- डॉ. एमसी गुप्ता, निदेशक, पीजीआईएमएस