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शोध: बेटा हो या न हो, बेटियों की सुरक्षा की गारंटी तो हो

Wed, 25 Nov 2015 02:22 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, रोहतक
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कोख से बेटा जन्म ले या बेटी, समाज में बेटियों को सुरक्षित वातावरण जरूर मिले। वंश तो बेटियां भी बढ़ा सकती हैं। लेकिन जन्म से शादी तक समाज में उनकी सुरक्षा की गारंटी कौन देगा। शादी के बाद यदि ससुराल पक्ष का व्यवहार ठीक नहीं रहा तो बेटियां कैसे जीवन जी सकेंगी। समाज में अब यह चिंता घर कर गई है। यह खुलासा एमडीयू के मनोविज्ञान विभाग में हुए शोध में हुआ।
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 इस दौरान यह भी पता चला कि समाजसेवी संगठनों और सरकार के लाख प्रयास के बाद भी आमजन के दिलोे-दिमाग में बेटियों को सुरक्षा से जुड़े ढेरों सवाल हैं। यह हाल केवल ग्रामीण परिवेश में रहने वाले लोगों का नहीं हैं बल्कि शहर के पढ़े-लिखे बाशिंदे भी इसी चिंता में जी रहे हैं।

दरअसल प्रो. प्रोमिला बतरा के निर्देशन में पूरे प्रदेश के शहर और गांवों में शोधकर्ताओं ने पूरे पांच साल तक शोध किया। इस दौरान जाना गया कि बेटी और बेटियों को लेकर लोगों की क्या सोच है? जन्म के समय बेटियों से भेदभाव का असली कारण क्या है? युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक करीब 900 लोगों के विचार संकलित किए गए। समाज में ऐसी धारण है कि बेटियों से भेदभाव का कारण वंश को आगे बढ़ाना है।
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लेकिन शोध के दौरान जो तथ्य सामने आए वे इसके बिल्कुल विपरीत हैं। लोगों को वंश से ज्यादा बेटियों के लिए सुरक्षित माहौल की चिंता सता रही है। ग्रामीण परिवेश में रहने वाले लोगों के लिए तो यह चिंता जायज समझी जा सकती है, लेकिन शहरी और माडर्न लाइफ जीने वाले लोग भी इस चिंता से ग्रसित हैं। वे बेटियों के बजाय बेटों को पसंद कर रहे हैं। इस शोध के बाद साफ हो गया है कि कन्या भ्रूणहत्या के मामले में अब वंशवाद थोड़ा कम हुआ तो बेटियों की सुरक्षा ने सवाल खड़े कर दिए हैं।

केस स्टडी
केस 1. एक नवदंपति ने बताया कि बेटी हो या बेटा, वंश तो आगे चल ही जाएगा। लेकिन सबसे बड़ी चिंता बेटी की सुरक्षा को लेकर है। उसकी सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?

केस 2. एमडीयू की एक छात्रा का कहना है कि समाज में भले ही कितनी भी सुरक्षा के ढोल पीटे जा रहे हों, घर से यूनिवर्सिटी आने में कितना असहज महसूस करते हैं बता नहीं सकते।

फोटो समेत
महिलाएं जागरूक हों, तभी बने बात : प्रो. बतरा

रोहतक। हर साल 25 नवंबर को अंतरराष्ट्रीय नारी हिंसा उन्मूलन दिवस मनाया जाता है। यूं तो साल भर महिलाओं को जागरूक करने के तमाम कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, लेकिन यह दिन नारी के साथ-साथ सभी के लिए खास है। इस उपलक्ष्य में अमर उजाला ने महिलाओं के हक में काम करने वाली प्रो. प्रोमिला बतरा (डीन, फैकल्टी ऑफ सोशल साइंस और मनोविज्ञान, एमडीयू) से सीधी बात। पेश हैं बातचीत के कुछ अंश।

प्रश्न : नारी हिंसा के मुख्य कारण क्या हैं?
उत्तर : नारी एवं पुरुष में असमान शक्ति प्रदर्शन ही इस हिंसा का मुख्य कारण है। विकास की तीव्र गति के साथ-साथ नारी में जागरूकता उत्पन्न हुई और महत्वाकांक्षा भी बढ़ी। इसी के साथ नारी में शक्ति प्रदर्शन की इच्छा तीव्र हुई। बढ़ती महत्वाकांक्षा और उसकी पूर्ति नहीं होने के कारण हिंसा को और अधिक बढ़ावा मिला है।

प्रश्न : इस हिंसा के क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर : हिंसा से घरों की शांति भंग होती है। इससे बच्चे सहम जाते हैं। डरपोक बनते हैं और उनमें अपराध की प्रवृत्ति बढ़ती है। वे क्रोधी बन जाते हैं। मस्तिष्क एवं योग्यताओं का पूर्ण विकास नहीं हो पाता। नारी के उत्पीड़न से वह शारीरिक और मानसिक रूप से भी परेशान हो जाती है। कन्या भ्रूणहत्या भी इसी का परिणाम है।

प्रश्न : हिंसा रोकने के संभावित उपाय क्या हैं?
उत्तर : सरकार के साथ नारी को खुद भी खड़ा होना होगा। आम आदमी, मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री को भी महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी, जिससे नारी अपनी शक्ति को पहचान सके। महत्वाकांक्षा होना गलत नहीं है, लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा को पूरी करने के लिए उचित तरीके सीखने होंगे। परिवार को एकजुट लेकर चलना होगा।
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