स्कूली बच्चों की नजरों से ब्लैक बोर्ड ओझल होने लगा है। मोबाइल, लैपटॉप, टैब, स्क्रीन से चिपके होने से यह स्थिति बन रही है। कोविड के बाद से हालात ज्यादा बिगड़े हैं। पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (पीजीआईएमएस) के क्षेत्रीय नेत्र रोग संस्थान के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां की ओपीडी में रोजाना करीब 20 प्रतिशत केस नजरें कमजोर होने के आ रहे हैं।
नेत्र रोग विभाग में हुई सीएमई में डॉ. कनूप्रिया विज का पेपर रहा प्रथम
इस समस्या पर अध्ययन कर डाॅ. कनूप्रिया ने रोहतक ऑप्थेल्मोलॉजिकल सोसाइटी की ओर से लेक्चर थियेटर वन में रविवार को आयोजित कंटिन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन (सीएमई) और एसोसिएशन ऑफ कम्युनिटी ऑप्थेल्मोलॉजिस्ट ऑफ इंडिया (एसीओआईएन) की वार्षिक बैठक में अपना पेपर प्रस्तुत किया। इसे यहां प्रथम पुरस्कार मिला।
पीजीआई की ओपीडी में नजर कमजोर होने की शिकायकत करने वाले केस करीब 20 प्रतिशत
अमर उजाला से बातचीत में क्षेत्रीय नेत्र रोग संस्थान की पीजी की छात्रा डॉ. कनूप्रिया विज ने अध्ययन की जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि विभाग की ओपीडी में करीब 400 मरीज रोजाना इलाज के लिए आ रहे हैं। इनमें से करीब 20 प्रतिशत नजरें कमजोर होने की शिकायत वाले होते हैं। इनमें आठ से 15 वर्ष के बच्चे भी शामिल है। ये बच्चे परिवार से कक्षा में ब्लैक बोर्ड या दूर की चीजें दिखाई न देने या धुंधली नजर आने की शिकायत करते हैं। इनकी जांच व आदतों में सामने आया कि ये ज्यादातर समय मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैब या टीवी की स्क्रीन पर बिताते हैं।
आठ से 15 वर्ष के 30 बच्चों पर किया अध्ययन
आठ से 15 वर्ष के 30 बच्चों पर अध्ययन किया गया। इन्हें 15-15 के दो ग्रुपों में बांटा गया। इनमें से 15 बच्चों को सिर्फ चश्मा दिया गया। जबकि अन्य 15 को चश्मे के अलावा दवा व व्यायाम कराया गया। चश्मे के साथ दवा डालने व व्यायाम करने वाले बच्चों की आंखों में सुधार दर्ज किया गया। जबकि केवल चश्मे लगाने वाले बच्चों का नंबर बढ़ गया। इस अध्ययन को नेशनल सीएमई में सभी ने सराहा। इसे प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ।
अधिकारी के अनुसार
कोविड के बाद हम डिजिटल युग की ओर बढ़ चले हैं। हमारा ज्यादातर समय स्क्रीन पर बीतता है। इसमें मोबाइल, टीवी, लैपटॉप और टैब मुख्य है। पीजी छात्रा के अध्ययन में सामने आया है कि इस स्थिति से समय रहते इलाज लेकर बचा जा सकता है। स्क्रीन पर समय कम बिताने के साथ नजर कमजोर होने का पता लगते ही सही चिकित्सक से इलाज लेना बेहतर है।
-डॉ. सुमित, प्रोफेसर, क्षेत्रीय नेत्र रोग संस्थान, पीजीआईएमएस।