मुंह के बिखरे टुकड़ों को दोबारा जोड़ना था चुनौती
ऑपरेशन की सबसे बड़ी जटिलता मरीज के मुंह के बिखरे टुकड़ों को दोबारा पहले की तरह जोड़ना था। निचले जबड़े में दो फ्रैक्चर थे। इन सभी को सफलतापूर्वक ठीक करना चिकित्सकों के लिए भी नया अनुभव रहा। चिकित्सकों का दावा है कि दुनिया में इस तरह जान बूझकर मुंह में पटाखा चलाने का पहले कोई केस दर्ज नहीं हुआ था। इस सफलता के लिए स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एचके अग्रवाल व डेंटल कॉलेज प्राचार्य डॉ. संजय तिवारी ने टीम की सराहना की है।
डॉ. रविंद्र सोलंकी की देखरेख में हुआ ऑपरेशन
विभागाध्यक्ष प्रो. महेश गोयल के निर्देशानुसार प्रो. डॉ.रविंद्र सोलंकी ने टीम को लीड किया। उनकी देखरेख में डॉ. दिव्या, डॉ. ईशा, डॉ. आनंद व डॉ. शुभोदीप ने मरीज को नया जीवन दिया।