करवाचौथ पर कविता : स्त्री का शस्त्र व शास्त्र
करवा कोई बर्तन नहीं,
ये तो हाथ में धरा एक वरदान है,
कुम्हार के चाक से नहीं,
ये तो प्रेम की आंच में पका
एक अमर विधान है।
छलनी कोई जाली नहीं,
ये तो मन के विकारों को छानने की
पावन दृष्टि है,
जो चांद में चांद नहीं,
अपने ही सुहाग को देखती
एक सच्ची सृष्टि है।
एक दिन का व्रत नहीं,
ये तो युगों का तप है,
भूखी-प्यासी देह नहीं,
ये तो आत्मा का वह जप है,
जहां भोग नहीं, त्याग बोलता है,
जहां देह नहीं, अनुराग बोलता है।
भीतर से खाली है करवा,
जैसे अहंकार से खाली है
स्त्री का हृदय,
जो स्वयं रिक्त होकर भी
सबको पूर्ण करती है,
जो स्वयं तप कर भी
सबको तृप्त करती है।
युग बदलेंगे,
बाज़ार बदलेंगे,
पर जब तक चाँद है,
और छलनी है,
तब तक करवा
अमर है,
अमर है,
अमर है।
मनोज वशिष्ठ
शिक्षाविद साहित्यकार
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय
रेवाड़ी हरियाणा