भूखे रहकर लड़ी दुश्मन से लड़ाई, सेवानिवृत्ति के बाद नहीं मिल रही सुविधा
-पाक से वर्ष 1965, 1971 और 1999 में हुई लड़ाई शामिल रहे पैरामिलिट्री के जांबाज बोले
-जब तक ड्यूटी पर रहे हर दिन दुश्मन की गोली का सामना किया, रिटायर हुए तो कोई पूछने वाला नहीं
-पैरामिलिट्री के जवानों का न कोई बोर्ड है न अस्पताल, शहीद का दर्जा तक नहीं है हमें
विकास सैनी
रोहतक। युद्ध। यह एक शब्द नहीं है। यह अपने आपमें पूरी दास्तां है। देश को आर्थिक नुकसान ही नहीं, अनगिनत लोग मारे जाते हैं। फिर भी अपने देश व देश की जनता की रक्षा के लिए लड़ना पड़ता है। फिर वह भूखे रह कर ही क्यों न लड़ना पड़े। हमने ये दिन देखे नहीं, जीए हैं। पाक से वर्ष 1965, 1971 व 1999 में हुई लड़ाई में न केवल हिस्सा लिया, बल्कि दुश्मन को नाकों चने चबवाए। इस दौरान सात-सात दिन बगैर खाए पीए, लड़े। अब सेवानिवृत्त हो गए तो हमें कोई याद करने वाला नहीं है। सरकार के लिए तो जैसे हम हैं नहीं। हमारे लिए कोई सुविधा नहीं, कोई बजट नहीं। हमें तो शहीद तक का दर्जा नहीं है। यह कहना है आईटीबीपी के सेवानिवृत्त असिस्टेंट कमांडेंट राममेहर का। अकेले यही ऐसे नहीं हैं। इनके जैसे पैरामिलिट्री के और भी जवान हैं, जिन्हें सरकार की उपेक्षा खल रही है। पुलवामा हमले व वायु सेना की एयर स्ट्राइक को लेकर बने युद्ध के हालात पर अमर उजाला ने पैरामिलिट्री के सेवानिवृत्त जवानों से बात की तो उन्होंने अपना दर्द कुछ यूं बयां किया।
पाक से लड़ चुका हूं तीन लड़ाई
पूर्व असिस्टेंट कमांडेंट राममेहर ने बताया कि युद्ध लोगों के लिए एक शब्द होगा। जवानों के लिए पूरी कहानी है। मैंने एक नहीं तीन युद्ध लड़े हैं। पहला 1965 में राजौरी सेक्टर में पाक के साथ। यह गोरिल्ला युद्ध था। उस समय 22 साल का था। मैं 19 की उम्र में भर्ती हो गया था। उस समय 1962 की चीन के साथ लड़ाई बंद हुई थी। इसके बाद वर्ष 1971 में थानाधार उड़ी सेक्टर व 1999 में कारगिल में बतौर सहायक लड़ाई लड़ी। ये आमने-सामने की लड़ाई थी।
सात दिन बाद मिली सूखी रोटी पानी में भिगो कर खाई
युद्ध के दौरान हालात बेहद खस्ता होते हैं। यहां सबसे पहले खाने-पीने की दिक्कत शुरू होती है। अपनी लड़ी तीन लड़ाइयों में यह कड़वा सच बेहद करीब से समझा। वर्ष 1965 की लड़ाई अब भी याद है। हम सात दिन तक भूखे प्यासे लड़ते रहे। युद्ध के दौरान मैस बंद रही। सातवें दिन हैलीकॉप्टर ने आकाश से खाने के पैकेट गिराए। दुश्मन की गोलियों के बीच जमीन पर रेंगते हुए इन्हें किसी तरह इकट्ठा किया। इसमें सूखी रोटी, गुड़ व चने मिले। रोटी पानी में भिगो कर नरम की और गुड़-चने के साथ खाई। इसी खुराक के सहारे दुश्मन से लड़े।
पहली लाइन में खड़े हैं पैरामिलिट्री के जवान
पैरामिलिट्री देश की सीमाओं की सुरक्षा करती है। यह पहली लाइन में रहती है। दुश्मन की गोली चलती है या हमला होता है, तो पहला वार पैरामिलिट्री ही झेलती है। सेना तो हमसे दो किलोमीटर दूर रहती है। दुश्मन के एकदम सामने खड़े रहकर हम लड़ते हैं। युद्ध शुरू होने के बाद सेना आती है। इस बीच सीमाओं की सुरक्षा बीएसएफ, आईटीबीपी व आसाम राइफल के हवाले रहती है।
न शहीद का दर्जा न कल्याण के लिए बोर्ड
जान का जोखिम उठाकर दुश्मन का सबसे पहले सामने करने वाले पैरामिलिट्री के जवानों से सरकार बिल्कुल अनजान है। शायद यही वजह है कि हमारी सुविधाओं पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जबकि सेना के जवानों के लिए हर सुविधा है। पैरामिलिट्री के जवान मारे जाएं तो उन्हें शहीद तक का दर्जा नहीं है। सेवानिवृत्ति के बाद भी कोई सुनने वाला नहीं है। सैनिक बोर्ड की तरह पैरामिलिट्री के पूर्व सैनिकों के कल्याण का ध्यान रखने वाला बोर्ड ही नहीं है।
स्कूल कॉलेज में दाखिला हो या नौकरी, आरक्षण नहीं
पैरामिलिट्री के जवानों के लिए सरकार ने आरक्षण तक की व्यवस्था नहीं की है। स्कूल, कॉलेज में दाखिला लेना हो या नौकरी की बात हो, हर जगह पैरामिलिट्री के जवानों के बच्चों को आम आदमी की तरह लाइन में खड़ा होना पड़ता है। जबकि सेना के जवानों को यह सुविधा मिल रही है। यही नहीं पैरामिलिट्री व सेना के जवानों के वेतन में भी फर्क है। पैरामिलिट्री के सिपाही का वेतन ही सेना के जवान से चार हजार रुपये कम है।
ट्रेनिंग के बाद सीधा सीमा पर गया लड़ने
भारत-पाक के बीच वर्ष तीन दिसंबर 1971 में लड़ाई हुई थी। यह कभी भूल नहीं सकता। पैरामिलिट्री फोर्स बीएसएफ में नया भर्ती हुआ था। उस समय 20 साल का था। ट्रेनिंग होते ही सीधे सीमा पर लड़ने गया था। घर आने का मौका तक नहीं मिला। छुट्टियां रद्द कर दी गई थीं। उस दिन हम ड्यूटी पर थे। शाम के करीब सवा छह बजे थे। सभी जवान खाना खाने की तैयारी में थे। इसी दौरान पाक सैनिकों ने फाजिला सेक्टर में हमला बोल दिया। खाना रखा रह गया। सभी जवान खाना छोड़ कर मोर्चा संभालने दौड़ पड़े। दोनों ओर से सुबह सवा चार बजे तक गोलीबारी होती रही।
-प्रेम सिंह मलिक, सेवानिवृत्त कांस्टेबल, बीएसएफ
वायरलेस पर मिला पीछे हटने का संदेश
पूर्व कांस्टेबल प्रेम सिंह ने बताया कि हमें वायरलेस पर पीछे से स्पोर्ट नहीं मिलने बात कहते हुए वहां से निकलने का निर्देश दिया गया। इसके बाद सभी जवान जमीन पर रेंगते हुए तीन किलोमीटर दूर बने अपने पक्के डिफेंस (बंकर) अड्डे पर पहुंचे। यह दूरी हमें दो घंटे में पूरी करनी थी। इसके बाद ब्रिज उड़ा दिया गया। ऐसा दुश्मन सेना के टैंकों को आगे बढ़ने से रोकना था। यहां भी दोपहर करीब 12 बजे खाना मिला। यहां से हमें दूसरे मोर्चे पर भेज दिया गया। यहां जाते समय रास्ते में हादसा हो गया। सारे जवान घायल हो गए। हम पांच जवान बचे थे। वह भी लहूलुहान हालत में। हमें फाजिल्का मुख्यालय लाया गया। यहां मदद मिलने पर घायलों को इलाज के लिए छोड़ हम अन्य जवानों के साथ मोर्चे पर पहुंचे।