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अस्पताल में 403 दवाइयां मौजूद, फिर भी मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रही

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सामन्य अस्पताल में दवा लेने के लिए काउंटर पर खड़े मरीज। अमर उजाला
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जिला अस्पताल के रिकॉर्ड में भले ही 403 दवाएं उपलब्ध हैं, लेकिन प्रतिदिन ओपीडी में आने वाले सैकड़ों मरीजों को अधिकांश दवाएं बाहर से खरीदनी पड़ती है। स्थिति यह है कि मरीज शिकायत भी नहीं कर सकते। क्योंकि उनका उपचार वही डॉक्टर करते हैं, जो बाहर की दवाएं लिखते हैं। मरीजों को औसतन 60 प्रतिशत दवाएं बाहर की ही खरीदनी पड़ रही है।
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स्वास्थ्य विभाग के अनुसार उनके यहां दवाओं का कोई टोटा नहीं है, अधिकांश एंटी बॉयोटिक, दर्द निवारक, ताकत और एलर्जी की दवाएं स्टोर में उपलब्ध हैं। जिला अस्पताल के आपात विभाग में रेबीज व स्नैक बाइट तक के टीके उपलब्ध हैं। यहां के दवा काउंटरों पर मरीजों की लंबी कतार भी लगी रहती है। लेकिन यहां मिलती एक-दो दवाएं ही हैं। अधिकांश महंगी दवाएं बाहर की ही लिखी होती हैं। मरीजों का कहना है कि काउंटर के बाहर लिस्ट तक नहीं लगी होती की उनके यहां कौन सी दवाएं उपलब्ध हैं। ओपीडी में बैठे डॉक्टर वही दवा क्यों नहीं लिखते जोकि अंदर उपलब्ध है।
जेनरिक दवाओं के नाम से नहीं लिखी जाती दवा
सरकार का निर्देश है कि डॉक्टर मरीज के कार्ड पर जैनरिक दवाओं के नाम ही लिखेंगे। लेकिन जिला अस्पताल में अधिकांश डॉक्टर निजी कंपनी की कंबिनेशन वाली दवाएं लिखते हैं। जोकि अमृत फार्मेसी स्टोर या सरकारी दवा काउंटर पर उपलब्ध ही नहीं हो सकती। ऐसे में मरीजों के लिए निजी केमिस्ट स्टोर से दवा खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
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मरीजों का दर्द
हम पहली बार अस्पताल में आए हैं, इससे पहले हमेशा से ही निजी अस्पताल में दिखाया। डॉक्टर ने पांच दवाइयां लिखकर दीं और कहा कि यहां से मिल जाएंगी, मगर डिस्पेंसरी से एक ही दवाई मिली है, बाकी बाहर से लेनी होंगी। -अश्विनी मनचंदा , कलानौर
डॉक्टर ने चार दवाइयां लिखकर दी, इसमें से हमें सिर्फ दो दवाइयां ही मिल पाई हैं। डॉक्टर जो दवा लिखकर देते हैं वह सारी यहां नहीं मिलती। सिर्फ सस्ती दवाइयां ही अस्पताल की डिस्पेंसरी में मिलती हैं। महंगी दवाइयां अस्पताल के बाहर मेडिकल स्टोर से खरीदनी पड़ती है, जिसकी वजह से काफी परेशानी होती है। - बंटी, रोहतक
मुझे हाथ में चोट लगी है। डॉक्टर ने मुझे चार तरह की दवाइयां लिखी हैं। इसमें से तीन तरह की गोलियां और एक ट्यूब थी। गोलियां तो मुझे अस्पताल के अंदर डिस्पेंसरी से मिल गईं, मगर ट्यूब नहीं मिली। उसके लिए कहा गया कि यह बाहर से लेनी पड़ेगी। अभिषेक, रोहतक
मुझे स्किन की दिक्कत है। इसकी दवाइयां मुझे ज्यादातर बाहर से लेनी पड़ती है। डॉक्टर ने तीन दवाइयां लिखी थीं, लेकिन डिस्पेेंसरी से सिर्फ एक ही दवा मिली है। -रितु, रोहतक स्टोर में 403 दवाएं उपलब्ध हैं। हमारा बजट चंडीगढ़ से जारी होता है। सारी दवा ड्रग वेयर हाउस से आती है। यदि वार्ड या आपातकालीन विभाग में दवाएं कम पड़ती हैं तो हम आरसी पर खरीद लेते हैं। इनडोर मरीजों को कोई समस्या नहीं है। यदि ओपीडी के मरीजों को बाहर की दवा लिखी जाती है तो उसकी हम जांच करा लेंगे। क्योंकि अधिकांश दवाएं हमारे पास उपलब्ध हैं। यदि कोई शिकायत देता है तो उसकी जांच कराई जाएगी। -डॉ. रमेश चंद्र, चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल।
डॉक्टर बाहर की दवा निजी कंपनी के नाम से नहीं लिख सकते। जैनरिक नाम से ही दवा कार्ड पर लिखी जानी चाहिए। यदि किसी को समस्या है तो वह एमएस व सिविल सर्जन कार्यालय में संपर्क कर सकता है। -डॉ. अनिल बिरला, सिविल सर्जन।
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