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मरीजों के साथ अब जेल अधीक्षक भी डॉक्टरों की ब्रांडेड दवाओं से परेशान

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मरीजों के साथ जेल अधीक्षक भी डॉक्टरों की ब्रांडेड दवाओं से परेशान
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जेनेरिक दवा लिखना अनिवार्य करने को किया पत्राचार

संजय कुमार
रोहतक। डॉक्टरों और निजी दवा कंपनियों के बीच चलने वाले 30 से 40 फीसदी कमीशन कट का लालच मरीजों पर हमेशा भारी पड़ता है। इसी लालच वश डॉक्टर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के निर्देशों के बावजूद मरीजों को ब्रांडेड दवाएं ही लिखते हैं। मजबूरी में मरीज तो मौन हो जाता है, लेकिन अब इसके खिलाफ जींद के जेल अधीक्षक ने आवाज उठाई है। उन्होंने पत्र जारी कर डॉक्टरों को कैदियों के लिए जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य करने को कहा है।
जेल अधीक्षक की ओर से जारी पत्र में डायरेक्टर जरनल हेल्थ सर्विस हरियाणा के आदेशों का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि सरकार के नियमानुसार डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवाएं ही लिखना अनिवार्य है तो ब्रांड नाम लिख कर क्यों नियम तोड़ा जा रहा है। इस संबंध में पीजीआईएमएस रोहतक के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नित्यानंद ने सभी डॉक्टर्स को निर्देश जारी किए हैं कि मरीजों को जेनेरिक दवाएं ही लिखें। यह पत्र निदेशक पीजीआईएमएस रोहतक के अलावा निदेशक बीपीएस गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज खानपुर कलां व सिविल सर्जन जींद को जारी किया गया है। इससे पहले एमसीआई ने 2016 में गजट नोटिफिकेशन कर डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य किया था। इस संबंध में दो बार पीजीआईएमएस रोहतक में भी निर्देश जारी हुए, लेकिन इन आदेशों को मानने वाला कोई नहीं है।
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डॉक्टर नहीं पसंद करते जेनेरिक दवाएं लिखना
कमीशन के चक्कर में डॉक्टर कभी भी जेनेरिक दवाएं लिखना पसंद नहीं करते। अकेले पीजीआईएमएस व जिला अस्पताल रोहतक की बात करें तो एक फीसदी डॉक्टर ही जेनेरिक दवाएं लिख रहे हैं। निजी कंपनी की पकड़ का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ओपीडी समय शुरू होने से बंद होने तक ओपीडी के बाहर निजी दवा कंपनियों के एमआर का जाल बिछ जाता है। स्थिति यह है कि कुछ एमआर तो अपने आगे अपनी दवाएं लिखवाते हैं। पीजीआईएमएस के कुछ डॉक्टरों के नाम पर मेडिकल मोड़ पर स्पेशल दुकानें हैं, यदि वहां से मरीज सामान नहीं लेता तो उसका उपचार ही नहीं हो पाता। स्वयं स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज भी इस बात का अपने पहले दौरे में खुलासा कर चुके हैं, लेकिन कार्रवाई आज तक नहीं हुई।
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क्यों नहीं खोला जाता जन औषधालय
सबसे बड़ा सवाल है कि जब पीजीआईएमएस में डॉक्टरों का जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य है तो कैंपस में जेनेरिक दवाओं के लिए जन औषधालय क्यों नहीं खोला जाता। स्थिति यह है कि फिलहाल कैंपस में जो दुकानें खुली हैं, उनका प्रतिदिन का खर्च 30 से 35 हजार रुपये आता है। ऐसे में मरीजों को सस्ती दवा मिलने की कल्पना करना बेमानी ही है। मेडिकल मोड़ को तो दवा मंडी का नाम दिया जाए तो गलत नहीं होगा। यहां 100 से अधिक मेडिकल स्टोर हैं, ऐसे में जेनेरिक दवाओं को शुरू कर पाना संस्थान के लिए किसी चैलेंज से कम नहीं होगा।
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