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गले की फांस बनता जा रहा पीजीआईएमएस का गार्ड घोटाला

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पीजीआईएमएस गार्ड घोटाला में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम जांच से असंतुष्ट
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नये सिरे से जांच कराने की सिफारिश
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक।
पीजीआईएमएस का गार्ड घोटाला सभी के गले की फांस बनता जा रहा है। इस मामले पर दिसंबर 2017 में जांच के लिए आई राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की टीम ने भी घोटाले की जांच पर सवाल उठाये हैं। इसमें निजी कंपनी ने लाखों रुपये का घोटाला किया था। प्रशासन ने इस मामले में निजी कंपनी पर मामला दर्ज करवाते हुए अपने दो सुरक्षा अधिकारियों को निलंबित कर रखा है। जांच टीम ने इस मामले पर चल रही जांच पर असंतुष्टि जताते हुए नये सिरे से जांच करने की सिफारिश की है।
78 लाख रुपये का गार्ड घोटाला उजागर करने वाले सुरक्षा अधिकारियों बादाम सिंह व संजय सांगवान को ही संस्थान ने सबसे पहले निलंबित कर दिया। लेकिन घोटाले में शामिल निजी कंपनी को राहत दी गई, प्रबंधन ने आरोपी एजेंसी का समय समाप्त होने के बाद पांच माह की एक्सटेंशन दे दी। वहीं निलंबित सुरक्षा अधिकारी अभी न्याय के लिए भटक रहे हैं। इस मामले में दोनों अधिकारियों के अलावा अभी किसी अन्य का नाम सामने नहीं आया है। जबकि सवाल उठता है कि क्या दोनों सुरक्षा अधिकारियों के बलबूते ही इतना बड़ा घोटाला हो रहा था। इस संबंध में गठित एसआईटी की भी अभी तक कोई अंतिम रिपोर्ट नहीं मिल पाई है। गौरतलब है कि संस्थान में आउट सोर्सिंग पर 625 सिक्योरिटी गार्ड्स और 15 सुपरवाइजर तैनात किए गए। इसमें ओरियोन सिक्योरिटी साल्यूशंस नामक कंपनी को एक अक्टूबर 2015 से 30 नवंबर 2017 तक दो साल के लिए संस्थान की सुरक्षा का टेंडर अलाट हुआ। मार्च 2017 में सिक्योरिटी ऑफिसर बादाम सिंह और संजय सांगवान को शिकायत मिली कि सुरक्षा कंपनी कुछ लोगों की फर्जी हाजिरी दिखाकर रुपये क्लेम कर रही है। लेकिन हकीकत में उन लोगों को तैनात ही नहीं किया जाता। इसकी जांच की गई तो पता चला कि निजी कंपनी फर्जीवाड़ा कर रही है। जांच के दौरान अक्टूबर 2015 से दिसंबर 2016 तक बिलों में तकरीबन 78 लाख का फर्जीवाड़ा मिला, जबकि तीन महीनों के बिल ही नहीं मिले। दोनों सुरक्षा अधिकारियों ने फर्जीवाडे़ का पुलिंदा तैयार किया और 26 मई 2017 को संस्थान के उच्च अधिकारियों को भेज दिया। इसमें सिफारिश की गई कि निजी कंपनी के खिलाफ तुरंत एफआईआर दर्ज कराई जाए, इसकी बैंक गारंटी से रिकवरी की जाए और इसकी पेमैंट को रोककर ऑडिट कराया जाए। पीजीआईएमएस प्रबंधन ने जब इस मामले में अपनी जांच शुरू की तो माना कि गड़बड़ी हुई है और सुरक्षा अधिकारियों द्वारा जो भी तथ्य दिए गए हैं, सब ठीक हैं। जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में वही सिफारिशें लिख दी, जो सुरक्षा अधिकारियों ने की थी। इसमें एक नई बात लिखी गई कि बिना सुरक्षा अधिकारियों की जानकारी के यह घोटाला नहीं हो सकता। इसलिए सुरक्षा अधिकारियों पर भी कार्रवाई होनी चाहिए। जांच अधिकारी ने कार्रवाई का कोई आधार नहीं दिया और न ही स्पष्ट किया कि घोटाले में संस्थान के दोनों सुरक्षा अधिकारियों की संलिप्ता कैसे हो सकती है। इस मामले की जांच तक नहीं की गई कि यह घोटाला किस अधिकारी के इशारे पर हुआ है और कौन-कौन इसमें शामिल हैं। पूरी जांच करने के विपरीत नवंबर 2017 में दोनों सुरक्षा अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया और संस्थान निजी कंपनी पर मेहरबान रहा। इस संबंध में निलंबित मुख्य सुरक्षा अधिकारी बादाम सिंह ने बताया कि उन्होंने गड़बड़ी की जांच अधिकारियों को सौंपी थी। इसके बाद मामला काफी समय पेंडिंग रखा गया। बाद में बिना आधार उनको ही निलंबित कर दिया गया। चोरी करने वाली कंपनी उल्टा उन पर आरोप लगा रही है और बगैर जांच संस्थान उन पर ही कार्रवाई कर रहा है।
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डॉक्टर और शीर्ष अधिकारी को बचाने के चक्कर में चल रहा खेल
गार्ड घोटाले में संस्थान ने अपने दो सुरक्षा अधिकारियों पर गाज गिरा कर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने का खाका खींच लिया है। जबकि इस मामले में डॉक्टर से लेकर शीर्ष अधिकारियों की भी संलिप्तता है। अब संस्थान अपने डॉक्टरों को बचाने के लिए इस जांच को आगे नहीं बढ़ने देना चाहता। क्योंकि गार्ड घोटाला हुआ है तो इसके पेमेंट की अदायगी बगैर अधिकारियों के मेल जोल के नहीं हो सकती। सबसे बड़ा सवाल है कि घोटाला उजागर होने के बाद निजी कंपनी को ही एक्सटेंशन क्यों दी गई।
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