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टीनेजर नहीं झेल पा रहे तनाव, कर रहे आत्महत्या का प्रयास

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रोहतक। यदि आपका बच्चा टीनएजर है तो आप सावधान हो जाएं, क्योंकि मेडिकल रिपोर्ट में सामने आ रहा है कि अधिकांश टीनएजर्स अब दबाव नहीं झेल पा रहे हैं। पलक झपकते ही यह आत्महत्या करने या आत्महत्या करने का दिखावा करने का प्रयास करते हैं और अपनी जान संकट में डाल लेते हैं। नौबत यहां तक आ गई है कि अकेले जिला अस्पताल में पांच से छह बच्चों को प्रतिदिन परिजन उपचार के लिए ला रहे हैं।
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क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सुमन हुड्डा व साइकेट्रिक सोशल वर्कर मेनका की मानें तो पहले 16-17 आयु के किशोर व किशोरियों में ऐसी समस्या होती थी। अब यह समस्या 11 से 18 आयु वर्ग वालों के बीच आ रही है। लड़कियां व लड़के ब्रेकअप होने, एकतरफा प्रेम, परीक्षा का तनाव, आजादी पर प्रतिबंध लगने, घर में अनदेखी होने जैसे मामलों में अधिक तनाव में आ जाते हैं। खालीपन व तनाव महसूस करने के कारण कुछ केस तो नशे की ओर बढ़ जाते हैं। समस्या बढ़ने पर आत्महत्या का प्रयास किया जाता है। एक्सपर्ट के अनुसार परिजनों व मेल-फीमेल पार्टनर के सहयोगियों को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए कि कई बार आत्महत्या की धमकी सिर्फ इसलिए दी जाती है कि उसकी ओर ध्यान दिया जाए और उसकी बात मानी जाए। कुछ मामलों में प्रयास आत्महत्या का ही होता है और कुछ मामलों में दिखावे के लिए ही होता है, जोकि भयावह बन जाता है। हाथ की नस काटना, फांसी लगाना, जहरीला पदार्थ का सेवन करना जैसी प्रक्रिया सामान्य है।

नशा बना है सबसे बड़ी समस्या
एक्सपर्ट की मानें तो हाथ में 20 से 25 कट मारे जाते हैं और बच्चा खून से चिट्ठी लिखता है। इस पर भी परिजन बदनामी के डर से उसे अस्पताल में उपचार के लिए नहीं लाएंगे तो परिणाम भयानक ही होगा। तनाव में डूबे किशोर-किशोरियों को परिजनों का सहारा मिलने के बजाय नशे का सहारा लेना पड़ता है। बडे़ तो दूर किशोरावस्था में भी नशे का प्रचलन बढ़ गया है। हैरानी की बात है कि इसमें निमभन, मध्यम व उच्च हर वर्ग के परिवार के बच्चे शामिल हैं।
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इंटरनेट पर आसानी से पोर्न मूवी की उपलब्धता बिगाड़ रही तानाबाना
बच्चाें का उपचार कर रही टीम की मानें तो घरों में मोबाइल व इंटरनेट आसानी से उपलब्ध हो जाता है। इसमें बच्चे जाने-अनजाने में पोर्न मूवी देखते हैं। इनका असर यह है कि आठ से दस वर्ष की उम्र में बच्चे गलत कामों में शामिल हो जाते हैं। यह सिर्फ नकल होती है, क्योंकि इस आयु में बायोलॉजिकल कोई इफेक्ट नहीं होता। परिजनों को चाहिए कि वह बच्चों का व्यवहार भांपकर तुरंत उसे बाल मनो चिकित्सक के पास ले जाएं। ऐसे बच्चे को परिवार की स्पोर्ट के साथ उसे मोटीवेट करना चाहिए। समय पर स्थिति पर काबू पा लिया जाए तो कोई समस्या नहीं होती है।
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