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पीजीआई में डायलिसिस यूनिट चलाने वाला बाहरी व्यक्ति चंपत

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खबर छपते ही पीजीआई में डायलिसिस यूनिट चलाने वाला बाहरी व्यक्ति लापता
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- मरीजों से ठगी का गोरखधंधा उजागर होने के बाद विभाग का कमरा हुआ खाली, प्रशासन चुप
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक।
पीजीआईएमएस में किडनी मरीजों से ठगी का मामला खुलने के बाद बाहरी व्यक्ति गायब हो गया है। संस्थान के लाला श्याम लाल सुपर स्पेशलिटी विभाग के कमरे में दुकान जमाए बैठा यह व्यक्ति सोमवार को नेफ्रोलॉजी विभाग में ही नहीं, कैंपस में भी नजर नहीं आया। अमर उजाला के सोमवार के अंक में मरीजों से ठगी व बाहरी व्यक्ति के हाथ में विभाग होने का खेल उजागर होने के बाद दिन भर कैंपस में हड़कंप मचा रहा। प्रशासन इस मामले को लेकर चुप है।
सोमवार को नेफ्रोलॉजी विभाग में रोज की तरह मरीजों का डायलिसिस किया गया। इसके लिए सीनियर के बजाय जूनियर डॉक्टर व नर्सिंग स्टाफ ही वहां दिखाई दिया। विभाग में संस्थान के एमएस व विभाग के इंचार्ज के कमरे के साथ जमी दुकान खाली नजर आई। यहां मरीजों को सप्लाई दिया जाने वाला सामान व उन्हें इंजेक्शन तक देने वाला व्यक्ति कैंपस से गायब रहा। कमरे में मेज व अलमारियां पहले की तरह जरूर मिलीं, मगर यहां उसका सामान नहीं था। विभाग में चल रहे इतने बड़े घालमेल को लेकर प्रशासन की चुप्पी सवालों में घेरे में है। इसे लेकर दिन भर कैंपस में चर्चाएं गर्म रहीं।
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स्टाफ का कहना है कि इस गड़बड़ी में नीचे से ऊपर तक लोग मिले हुए हैं। अकेला बाहर का कोई व्यक्ति आकर पूरे विभाग कब्जा नहीं कर सकता। मरीज को सामान बेचने, उसे इंजेक्शन देना नामुमकिन है। इसमें नर्सिंग स्टाफ, डॉक्टर सभी शामिल हैं। इन सभी पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। जबकि प्रशासन कुछ भी कहने से बचता नजर आ रहा है।

3 अधिकारी 1 डॉक्टर, फिर भी अयोग्य दे रहा स्वास्थ्य सेवाएं
पीजीआईएमएस के नेफ्रोलॉजी विभाग की डायलिसिस यूनिट में कहने को संस्थान के तीन शीर्ष अधिकारी व एक विभागाध्यक्ष संभाल रहे हैं। इसके बावजूद मरीजों को एक बाहरी व अयोग्य व्यक्ति स्वास्थ्य सेवाएं दे रहा है। इसके पास न तो कोई डिग्री है और न ही कोई डिप्लोमा। बाहरी व्यक्ति के यहां अवैध कब्जे ने साफ कर दिया है कि यहां वरिष्ठ अधिकारी खुद आने की जहमत नहीं उठाते हैं। जबकि डायलिसिस के लिए नेफ्रोलॉजिस्ट की मौजूदगी जरूरी है।
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यह है मामला
संस्थान के नेफ्रोलॉजी विभाग पर अरसे से एक बाहरी व्यक्ति ने कब्जा जमाया हुआ था। यहां डायलिसिस के सामान और इंजेक्शन के लिए वह 4200 रुपये तक वसूलता रहा। मरीजों को इंजेक्शन के साथ ड्रिप लगाने समेत एक डॉक्टर की तरह मरीज का हर काम करता रहा। इसके लिए यूनिट में ही उसे मेज, कुर्सी, अलमारी हर सुविधा मुहैया कराई गई। जबकि मरीज के परिजन खुद बाजार से खरीदें तो करीब 3200 रुपये में दवा व अन्य सामान आ सकता है। मरीजों से चल रही इस लूट की भनक अमर उजाला को लगी। इसके बाद टीम ने एक स्टिंग ऑपरेशन कर इस सारे मामले का खुलासा किया।
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