रोहतक। हरियाणा सरकार के निर्देशों पर पीजीआईएमएस के डॉक्टरों की विदेश यात्राओं की जानकारी जमा कराने की डेड लाइन एक बार फिर समाप्त हो गई है। धर्म संकट में अधिकारी एक बार फिर से आ गए हैं कि जिन्होंने रिकार्ड जमा नहीं कराया उन पर कार्रवाई कैसे करें। दुविधा है कि कुछ प्रतिशत ही डॉक्टर संस्थान में ऐसे हैं जोकि निजी दवा कंपनियों से ऐसी सुविधा नहीं लेते।
निजी दवा कंपनियों के प्रलोभनों से दूर रहने वाले संस्थान के डॉक्टरों को अब इंतजार है कि सरकारी नियम को ताक पर रख कर सुविधा लेने वालों पर सरकार क्या कार्रवाई करती है। कुछ डॉक्टर तो दबी आवाज में कहते हैं कि पूर्व निदेशक डॉ. नित्यानंद को फंसाने के लिए यह मकड़जाल बुना गया, जोकि उन्हें तो ले डूबा और अब कई डॉक्टरों के लिए मुसीबत खड़ी कर गया। यदि सही से इसकी जांच और कार्रवाई होती है तो सरकारी डॉक्टरों की निजी दवा कंपनियों से सारी सांठगांठ की पोल खुल जाएगी। चुनावी मौसम में सरकार के लिए भी यह मामला न तो दबाए दबेगा और न ही छुपाए छुपेगा। स्थिति यह है कि संस्थान का आरटीआई विभाग किसी डॉक्टर की हवाई यात्राओं व पासपोर्ट संबंधी जानकारी नहीं दे रहा है। दलील दी जा रही है कि यह डॉक्टर का निजी मामला है। जबकि एक-दूसरे के विरोधी डॉक्टर अपने सहयोगियों की ही अवैध विदेशी हवाई यात्राओं के पुख्ता सबूत लेकर बैठे हैं और सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं।
निदेशक कार्यालय अपने पास मौजूद रिकार्ड को ही मांग रहा
हैरानी भरा ही सही लेकिन सच यही है कि निदेशक कार्यालय के पास सभी डॉक्टरों की हवाई यात्राओं की डिटेल जमा है। कुछ डॉक्टरों का कहना है कि सारा रिकार्ड कार्यालय में उपलब्ध है तो उनसे क्यों मांगा जा रहा है। दूसरी ओर कहा जा रहा है कि डॉक्टरों से बार-बार रिकार्ड मांगा जाना सिर्फ मामले को लटकाने जैसा है। क्योंकि कोई सरकारी डॉक्टर अपने हाथ से अपने खिलाफ सबूत कैसे देगा।
डॉ. नित्यानंद के मामले के बाद बढ़ा विवाद
पूर्व निदेशक डॉ. नित्यानंद पर नकेल कसने के लिए संस्थान के कुछ डॉक्टरों ने उनके खिलाफ सबूतों की तलाश शुरू की और वह मंजिल तक पहुंच भी गए। डॉ. नित्यानंद की ओर से निजी दवा कंपनी से मांगी गई टिकटों के कागजात को आधार बना कर मुद्दा उठाया गया और हरियाणा सरकार ने उन्हें पद से निलंबित कर दिया। हालांकि डॉ. नित्यानंद ने इसे फर्जी बताया और अपनी बात सीएम तक भी पहुंचाई। लेकिन इस मामले में उन्हें कोई राहत नहीं मिली और उन्हें सेवानिवृत्त कर दिया गया। डॉ. नित्यानंद के पक्ष पर सरकार ने अन्य डॉक्टरों की भी जांच करवाने का आश्वासन दिया था।