योजना के तहत तोड़ने पड़े अपने ही कच्चे मकान, फंड नहीं आया तो नहीं मिली किस्त, छप्पर डालकर रहने को मजबूर
- वर्ष 2013 में सरकार गांव में रहने वाले बीपीएल परिवारों के लिए जिले में सौ करोड़ की लागत से राजीव आवास योजना लाई थी
- योजना को पांच वर्ष होने को हैं, लेकिन अभी तक लोगों को मकान बनाने के लिए किस्त नहीं मिली है, विभाग बताता है फंड नहीं
कुशाग्र मिश्रा
रोहतक।
रोहतक में गरीबी रेखा के नीचे रहे रह आठ गांवों के सैकड़ों परिवार सरकार की आवासीय योजना के तहत अपना पक्का आशियाना बसाने का सपना देखकर देख पछता रहे हैं। योजना की शर्त के तहत उन्हें अपने कच्चे मकान तोड़ने पड़े, लेकिन पक्का मकान बनाने के लिए सरकार से सारी किस्तें नहीं मिलीं। किसी को एक ही किस्त मिली तो किसी को एक भी नहीं। अब यह भी नहीं पता कि सिर के ऊपर पक्की छत कब आएगी। पिछले चार वर्ष से आंधी-तूफान और बारिश के साथ ही इनकी जंग जारी है। वर्ष 2013 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार गांवों में बसे बीपीएल परिवारों के लिए राजीव आवास योजना लेकर आई थी। सर्वे किया जाता है, जिसमें रोहतक के आठ गांवों के करीब 15 सौ परिवारों आते हैं, अब इन्हें आशियाना दिया जाना था। मकसद था कि गांवों को स्लम फ्री यानी झुग्गी-बस्ती से मुक्त कर देना। अपने पक्के मकानों की बाट जोह रहे सुनारिया कलां के लोगों ने अपना दर्द अमर उजाला टीम को बताया।
केस: 1
देखो म्हारा के हाल हो रैया सै, ढाई साल तै अपना ढूंड भी कोनी
सुनारिया कलां निवासी दिहाड़ी मजदूर सुरेंद्र का कहना है कि ढाई वर्ष पहले उनके मकान को राजीव आवास योजना के तहत मंजूरी मिली थी। अपना कच्चा मकान भी तोड़ना पड़ा और अभी तक एक भी किस्त नहीं मिली। 30 हजार रुपये उधार लेकर मकान की नींव भरवाई थी, यह रकम भी अब ब्याज के साथ 50 हजार हो गई है। एक हिस्से में तिरपाल डालकर उनका परिवार रहने को मजबूर है। अब बोल रहे - देखो म्हारा के हाल हो रैया सै, ढाई साल तै अपना ढूंड भी कोनी।
केस: 2
ईब तांई एक भी किस्त ना मिली...
सुनारिया कलां निवासी वजीर का मकान वर्ष 2013 में ही पास हो गया था, लेकिन ईब तांई एक भी किस्त ना मिली। वजीर और उनकी पत्नी ही यहां रहते हैं, जितनी जमा पूंजी थी, उसे सिर्फ अपने घर की नींव भी भरवा सके, लेकिन आगे मकान नहीं बन सका। सरकार की ओर से दी जाने वाली किस्त का इंतजार कर रहे हैं, किस्त मिले तो आगे के मकान का निर्माण कराए। राजीव आवास योजना का अपना सर्टिफिकेट भी दिखाते हुए कहते हैं, अभी तक तो बस यही मिला है।
फंड नहीं होने की बात कहकर लौटा देता है विभाग
जिले के आठ गांव बोहर, गढ़ी बोहर, गढ़ी माजरा, बलियाना, खेड़ी साध, पहरावर, कन्हेली और सुनारिया कलां में 1518 मकानों की डीपीआर करीब सौ करोड़ की लागत से तैयार की गई थी। एक परिवार को मकान के बनाने के लिए तीन लाख 70 हजार रुपये की रकम किस्तों में दी जानी थी। इनमें से 656 मकान सामान्य और 862 मकान एससी वर्ग के लिए थे। नगर निगम के आंकड़ों की माने तो इनमें से 1123 लोगों को मकान बनाने के लिए पहली किस्त मिली, लेकिन महज 941 लोगों को ही दूसरी किस्त मिली। तीसरी किस्त महज 424 लोगों को ही मिल सकी हैं। लोग नगर निगम के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन फंड नहीं होने की बात कहकर उन्हें लौटा दिया जाता है।