रेवाड़ी। पूर्वांचल के लोगों की आस्था का महापर्व छठ पूजा को लेकर तैयारी शुरू हो गई है। जिले में रह रहे पूर्वांचलवासियों की तरफ से शहर सहित धारूहेड़ा और बावल औद्योगिक क्षेत्र में इस पर्व को मनाने के लिए कृत्रिम घाट तैयार किए जाने लगे हैं। शहर में ही दो-तीन जगह बड़े आयोजन होते हैं।
पूर्वांचल सेवा समिति की ओर से सोलहराही सरोवर के पीछे कृत्रिम घाट बनाए जा रहे हैं। इस बार समिति ने 4 कुंड बनवाए हैं। यह पर्व 5 नवंबर से नहाय-खाय के साथ शुरू हो जाएगा। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व की शुरुआत स्नान कर, भगवान सूर्य को अर्घ्य व प्रसाद अर्पण करके होती है।
कृत्रिम घाट बनाने का कार्य शुरू सोहलराही सरोवर के निकट साफ सफाई कर टेंट लगाकर छठ पूजा के लिए पूर्वांचल सेवा समिति की ओर से व्यवस्था की जा रही है। नेहरू पार्क के साथ लगते रोड पर प्रवेश द्वार भी बनाया गया है। इसी तरह अन्य जगह पर भी टेंट लगाकर सजाया जा रहा है। नई अनाज मंडी में भी कृत्रिम घाट बनता है। इसी तरह कोनसीवास रोड पर भी छठ पूजा के लिए कृत्रिम घाट बनाया जाता है।
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कई साल से मनाते आ रहे त्योहार
पूर्वांचल सेवा समिति के प्रधान रामाधार शर्मा, चंदन, अरुण सिंह, हरिशचंद्र, मंगल देव शर्मा, भोला चौधरी, दिलीप, अश्वनी तिवारी और संतोष सिंह आदि ने बताया कि छठ पर्व का बड़ा महत्व है। महिलाएं कोई 2 वर्ष से तो कोई 21 साल से छठ मइया की पूजा कर रहा है। वह कई साल से सामूहिक रूप से त्योहार मनाते आ रहे हैं। लोगों को एक जगह ही अच्छा माहौल मिले, इसके लिए हर वर्ष आयोजन किया जाता है।
इस नियमानुसार मनेगा त्योहार:
पहला दिन :
नहाय-खाय : छठ पर्व की शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है। इस बार 5 नवंबर को होगा। इसमें शाम को अर्घ्य दिया जाता है।
दूसरा दिन :
खरना : छठ का दूसरा दिन खरना कहलाता है। इस दिन भोग तैयार किया जाता है। शाम को मीठा भात या लौकी की खिचड़ी खाई जाती है। खरना 6 नवंबर को मनेगा। खरना के दिन व्रती को पूरे दिन व्रत रखना होता है।
तीसरा दिन :
संध्या अर्घ्य : छठ पूजा में तीसरे दिन को सबसे प्रमुख माना जाता है। इस मौके पर शाम को भगवान सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। बांस की टोकरी में फलों, ठेकुआ, चावल के लड्ड आदि से सूप को सजाया जाता है। इसके बाद व्रती महिलाएं अपने परिवार के साथ मिलकर सूर्यदेव को अर्घ्य देती हैं। इस दिन डूबते सूर्य की आराधना की जाती है। छठ पूजा का पहला अर्घ्य 7 नवंबर को दिया जाएगा।
चौथा दिन :
प्रातः अर्घ्य: चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। ये अर्घ्य लगभग 36 घंटे के व्रत के बाद दिया जाता है। 8 नवंबर को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इसके बाद व्रती के पारण करने के बाद व्रत का समापन होगा।