कोसली। संत कंवर साहेब महाराज ने कहा कि मनुष्य जीवन में तन और मन के सुख के लिए अनेक साधन जुटाता है, लेकिन इनसे परे आत्मा का परम सुख है, जो संतों के सत्संग और नाम की भक्ति से प्राप्त होता है। संतों की दृष्टि में गुरुमुख सुखी और मनमुख दुखी होता है। गुरुमुख वह है जो अपनी बुद्धि और चतुराई के बजाय गुरु के वचनों पर विश्वास करता है, जबकि मनमुख अपने मन के अनुसार चलता है।
कंवर महाराज ने ये बातें कोसली के धरौली रोड स्थित राधास्वामी आश्रम में संगत को संबोधित करते हुए कहीं। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अनेक जन्मों के बाद मानव जीवन मिला है। यही वह योनि है, जिसमें भक्ति के माध्यम से आवागमन से मुक्ति का मार्ग समझने और अपनाने का अवसर मिलता है। सतगुरु इस मार्ग की युक्ति बताते हैं।
उन्होंने कहा कि संसार में ज्ञान की कमी नहीं है। किताबों, पुराणों और शास्त्रों में ज्ञान भरा पड़ा है, लेकिन केवल ज्ञान से जीवन का कल्याण नहीं हो सकता। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह आचरण में उतरे। भक्ति केवल बातों से नहीं, बल्कि करनी से होती है। मनुष्य के भीतर दीनता, प्रेम और दया का भाव होना जरूरी है।
संत कंवर ने कहा कि गुरु कभी शिष्य का अहित नहीं चाहता। गुरु की डांट, कठोरता और अनुशासन भी शिष्य के कल्याण के लिए होते हैं। उन्होंने साध-संगत से हर जीव को अपने समान समझने और किसी को कष्ट न देने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि परमात्मा को पाने के लिए संसार की वस्तुएं मांगने के बजाय भक्ति, दया, प्रेम और नेक कर्मों की मांग करनी चाहिए।
नशे और विषय-विकारों से दूर रहने की अपील
कंवर महाराज ने नशे और विषय-विकारों से दूर रहने की अपील करते हुए कहा कि नाम की कमाई मनुष्य के कर्मों के बंधन काटने में सहायक होती है। नाम संसार के विकारों को दूर करने वाली औषधि के समान है। उन्होंने कहा कि गृहस्थ जीवन जीते हुए भी मन को नाम से जोड़ा जा सकता है। हाथ काम में और मन नाम में लगा रहना चाहिए। परिवार में प्रेम, बुजुर्गों का सम्मान और बच्चों में संस्कारों की शुरुआत स्वयं से करनी चाहिए। तभी परिवार, समाज और संसार में अच्छाई का विस्तार होगा।