रेवाड़ी। कोरोना की दूसरी लहर में किसी ने अपने पिता को खोया तो किसी ने अपनी मां को। कोई अपने लाडले से दूर हो गया तो किसी ने माता-पिता दोनों को खो दिया। लेकिन इस कोरोना काल ने रिश्तों की सच्चाई दिखाई, कौन अपना है और कौन अपना होते हुए भी पराया ये भी बताया।
पिछले कुछ दिनों में शहर के श्मशान घाटों पर ढाई सौ से ज्यादा अंतिम संस्कार हुए। ये संस्कार अलग-अलग जिलों से आए कोरोना का इलाज करवाने वाले लोगों के थे, जिनकी इलाज के दौरान कोरोना से मौत हो गई थी। उनका संस्कार हुआ उसके बाद परिवार वाले उनकी अस्थियां लेकर चले गए। लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो अपने परिजन की अस्थियां लेने ही नहीं आए।
जिले के पांच शमशान घाटों पर करीब 65 अस्थियों को हिंदू रीति रिवाजों के साथ पैकेट में बंद करके रखा हुआ है। इनमें ऐसे परिवार शामिल है, जिनके परिवार में कोई न कोई कोरोना से संक्रमित है, जिसके कारण अस्थियों को नहीं ले जा पा रहे हैं। फिलहाल ये अस्थियां अपनों का इंतजार कर रही हैं, लेकिन लंबे समय से रखी ये अस्थियां ये सच्चाई बताती हैं कि आज के समाज में रिश्ते खोखले हो रहे हैं जो चला गया शायद उसने कभी सोचा भी नहीं होगा कि मेरे संस्कार के बाद मेरा कोई अपना मेरी अस्थियों को लेने नहीं आएगा।
सोलीराही के समीप श्मशान घाट के पुजारी राजू ने बताया कि उनके यहां करीब 12 मृतकों के अंतिम संस्कार के बाद अस्थियां रखी हुई है, जिन्हें जल्दी ही उनके परिजन ले जाएंगे। जिन मृतकों की अस्थियों यहां रखी है उनके परिवारों में कोई न कोई कोरोना से पीड़ित है। इसलिए अस्थियां को कुछ समय के लिए यहां रखा गया है। हालांकि अधिकांश लोग विसर्जन के लिए हाथों हाथ अस्थियों को ले जा रहे हैं।