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कुर्सी-मेज, टाट पट्टी, बिजली, खेल ग्राउंड से अनजान हैं बच्चे.

Fri, 05 Aug 2016 12:28 AM IST
ब्यूरो /अमर उजाला
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स्कूलों का हाल बेहाल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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गांव रामपुरा की धर्मशाला में चल रही प्राथमिक पाठशाला में बच्चों के लिए न पढ़ने को किताबें हैं और ना ही बैठने को कुर्सी-मेज और टाट पट्टी। हालात इतने बदतर हैं कि स्कूल परिसर में बरसाती पानी भरा है। बच्चे आए दिन पानी में फिसलकर गिर जाते हैं। स्कूल में बैठने के लिए उपयुक्त भवन ही नहीं है। कुछ कमरे हैं, तो उनकी स्थाई छत नहीं है। टीन-शेड से बनी छत से पानी टपकता है। जब धूप अधिक होती है, तो टीन-शेड के कमरे तपते हैं। वहीं उपयुक्त जगह और रसोई के अभाव में शौचालय के ठीक बगल में मिड-डे-मील पकाने का जुगाड़ किया हुआ है। ऐसे माहौल में बच्चों का जीवन एक कैदी से भी बद्तर हो गया है। इन हालातों के बावजूद भी शिक्षा विभाग आंखें मूंदे बैठा है। पेश हैं अमर उजाला संवाददाता चरण सिंह की स्कूल ग्राउंड रिपोर्ट।
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चार सौ गज जगह में स्कूल और पीएचसी
रामपुरा गांव की महज 400 गज जगह में राजकीय प्राथमिक पाठशाला व उप स्वास्थ्य केंद्र दोनो संस्थाएं संचालित हो रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि 160 बच्चों की संख्या वाले प्राथमिक स्कूल के लिए जहां यह जगह बहुत थोड़ी है, वहीं स्कूल परिसर में ही उप स्वास्थ्य केंद्र भी चल रहा है।

खुले आसमान में बनता है मिड-डे-मील
स्कूल परिसर में मिड-डे मील पकाने के लिए स्थाई रसोई का भी इंतजाम नहीं है। दूसरी ओर जगह का भी आभाव है। ऐसे में मजबूरन मिड-डे-मील शौचालय के बगल में खाली पड़ी जगह पर खुले चूल्हे पर पकाना पड़ रहा है। शिक्षकों का कहना है कि खुले में खाना पकने से कई बार मील में मच्छर-मक्खी व कीडे़-मकौड़े भी गिर जाते हैं, जिससे खाना दूषित हो जाता है।
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शिक्षा विभाग को कोसते हैं शिक्षक
प्राथमिक स्कूल रामपुरा में बच्चों की संख्या के हिसाब से दो शिक्षकों की कमी है। फिलहाल पढ़ाने के लिए केवल 4 शिक्षक है। खंडहर व टीन शेड वाले भवन में बिना बिजली के बच्चों व शिक्षकों का एक-एक दिन काटना मुश्किल हो गया है। बच्चों को पढ़ाने के लिए ब्लैक बोर्ड तथा पानी की टंकी शिक्षकों ने अपने पैसे से उपलब्ध कराई हैं। जबकि शिक्षा विभाग की ओर से उन्हें स्कूल संबंधी संसाधन बिल्कुल भी उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं।
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वर्जन:
स्कूल में एक भी मेज-कुर्सी नहीं है और ना ही दरी है। हमें टूटी-फूटी फर्श पर ही बैठकर पढना पड़ता है।
करण, छात्र
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बारिश में कमरे की छत से पानी टपकता है और ज्यादा धूप होने पर कमरे की टीन-शेड तपती है। हमें यहां कुछ सुविधा नहीं मिल रही है।
अजय, छात्र
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कक्षाओं में पंखें तो लगे हैं, लेकिन बिजली नहीं आने से बंद ही पड़े रहते हैं। हमें गर्मी में पढ़ाई करनी पड़ती है।
ज्योति, छात्रा
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स्कूल में पानी भरा रहता है। फिसलन होने से बच्चे पानी में रिपट जाते हैं। हमारे शिक्षक खुद झाडू से पानी को बाहर निकालते हैं।
गौरव, छात्र
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स्कूल में खेलने का ग्राउंड नहीं है। कमरे भी कम है। हमें स्कूल में घुटन सी महसूस होती है।
परी, छात्रा
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हमारे स्कूल में काफी बच्चों के पास पढने के लिए किताबे तक नहीं है। बच्चे एक-दूसरे की किताब मांगकर काम चलाते हैं।
अर्जुन, छात्र
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शिक्षा विभाग को कई बाद सूचित किए जाने के बाद भी आज तक हमें उपयुक्त संसाधन मुहैया नहीं कराए गए हैं। पहली व तीसरी कक्षा के बच्चों को पर्याप्त किताबें भी उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर स्कूल को जगह नहीं मिलने के कारण गांव की एक निजी धर्मशाला में संचालित हो रहा है। प्रशासन को चाहिए कि बच्चों के भविष्य को देखते हुए स्कूल के लिए उपयुक्त जगह सुनिश्चित की जाए तथा नया भवन निर्माण कर पर्याप्त संसाधन भी दिए जाएं।
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बबरूभान यादव, कार्यवाहक स्कूल हेड
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एक नजर:
कक्षाएं: पांच कक्षाएं लगती है, कुल 160 बच्चे हैं।
शिक्षक: 160 बच्चों पर 6 शिक्षक होने चाहिए। फिलहाल चार शिक्षक हैं।
भवन: भवन जर्जर है, 4 कमरे हैं, कक्षाओं के अनुसार 5 होने चाहिए।
बैठने की व्यवस्था: फर्नीचर नहीं है, जमीन पर बैठते हैं बच्चे।
स्कूल की चारदिवारी: है।
पानी निकासी व्यवस्था: नहीं है। स्कूल में जमा बरसाती पानी में बच्चे फिसल कर गिर जाते हैं।
बिजली: ज्यादा समय ठप रहती है।
पेयजल: पानी की टंकी है।
शौचालय: है।
कंप्यूटर लाइब्रेरी: राजकीय प्राथमिक पाठशाला में प्रावधान नहीं है।
कंप्यूटर शिक्षक: नहीं है।
शिफ्ट: एक शिफ्ट में ही लगता है।
एजूसेट सिस्टम: नहीं है।
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