बावल औद्योगिक क्षेत्र की सैकड़ों औद्योगिक इकाइयों की चिमनियों से निकलने वाला धुआं यहां रहने वाले करीब दर्जनों गांवों के लोगों के लिए आफत बन गया है। औद्योगिक विकास के लिए अपनी कृषि योग्य उपजाऊ भूमि को सरकार को देना आज ग्रामीणों के लिए है परेशानी का सबब बनता जा रहा है। आलम यह है कि शाम होते ही ग्रामीणों को न केवल जल्द ही अपने दरवाजे बंद करने पड़ते हैं बल्कि पशुओं के चारे को कपड़ों से ढक कर रखना पड़ता है।
चिमनियों से निकलने वाले धुएं में शामिल जहरीले पदार्थ ग्रामीणों को सांस आदि की बीमारी तो दे ही रहे हैं साथ ही जमीन पर पड़कर पानी और मिट्टी को भी पूरी तरह दूषित करते हैं। जब पौधे और जानवरों के जरिए ये जहरीले तत्व इंसानी शरीर में पहुंचते हैं तो रोग प्रतिरोधक क्षमता समेत कई बीमारी से घिरते हैं।
करीब तीन दशक पूर्व क्षेत्र के गांव चिराहड़ा, रूद्ध, जलियावास, सुठानी, सुठाना, बनीपुर, आसलवास, पातुहेड़ा, बखापुर आदि गांवों के लोगों ने औद्योगिक विकास के लिए अपनी कृषि भूमि सरकार को उद्योग लगाने के लिए दे दी थी। ताकि विकास के साथ साथ उनके बच्चों को रोजगार भी मिल सके, लेकिन औद्योगिक विकास के साथ ही यहां के लोगों की समस्याएं बढ़ने लगी हैं। विशेषकर छोटे कल-कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला धुआं आसपास के ग्रामीणों के आफत बन गया है। कारखानों का धुआं ने केवल जहरीला होता बल्कि लोगों के सांस लेने में भी कठिनाई पैदा कर रहा है।
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कृषि भूमि दी थी ताकि रोजगार मिल सके
स्थानीय लोगों का कहना है उन्होंने सरकार को अपनी कृषि भूमि इसलिए दी थी ताकि उनके बच्चों को रोजगार मिल सके। भूमि जाने के बाद इसका उलटा हुआ। न तो बच्चों को रोजगार मिला एवं न ही कोई विशेष सुविधा। इसके अलट ग्रामीणों को फैक्ट्रियों का धुआं उपहार में मिल रहा है। इससे लोगों में न केवल रोष है बल्कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के खिलाफ भी कई बार शिकायत कर चुके हैं।
गेट बंद और पशु का खाना भी रखते हैं ढंककर
यहां के चिराहड़ा, रूद्ध, जलियावास,सुठाना, सुठानी, बनीपुर, आसलवास, बखापुर, पातुहेड़ा,कसोली व कसोला सहित अनेक गांवों के लोग फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुवें से बचाव के लिए अपने घरों के दरवाजों को अक्सर बंद रखना पड़ता है। इसके अलावा ग्रामीणों को पशुओं के चारे को ढक कर रखना पड़ रहा है। फैक्ट्रियों के घुवें से पशु चारे एवं घरों पर धुओं जम जाता है।
ग्रामीणों को हो रही है बीमारियां
फैक्ट्रियों से निकलने वाले धुएं से अधिकांश बुजुर्ग एवं छोटे बच्चे ज्यादा चपेट में आ रहे हैं। कई बीमारियां तो ऐसी भी हैं जिससे लोगों की मौत भी हो जाती है। कुछ प्रमुख रोग जो लेते हैं चपेट में।
-फेफड़ों का कैंसर
-हृदय रोग
-स्ट्रोक यानी आघात
-अस्थमा
-महिला की प्रजनन क्षमता कम होना
-नवजात बच्चों की समय से पहले डिलीवरी हो जाती है।
-नवजात बच्चों का वजन कम होना।
-तपेदिक यानी टीबी
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क्या कहते है स्थानीय नागरिक-
चिमनियों से निकलने वाले धुएं से स्थानीय लोगों को काफी परेशानी हो रही है। अनेक लोग सांस की बीमारी की भी चपेट में आने लगे है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ऐसे कारखानों के खिलाफ एक्शन करना चाहिए।
चौधरी चरण सिंह, एडवोकेट।
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लोगों ने अपनी भूमि फैक्ट्रियों के लिए इसलिए दी थी ताकि उनके बच्चों को रोजगार मिल सके, लेकिन इसके बदले ग्रामीणों को कारखानों की चिमनियों से निकलने वाला जहरीला धुआं मिला है। इससे सभी लोग परेशान हैं। कई बार प्रदूषण बोर्ड को भी शिकायत कर चुके हैं। लेकिन नाम मात्र की कार्यवाही की जाती है।
दीपक, दुकानदार।
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फैक्ट्रियों का धुआं स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होता है, जिससे लोगों में बीमारी फैल रही है। उनके परिजनों ने अपनी भूमि इसलिए दी थी ताकि उन्हें सुविधाएं मिल सके, लेकिन यहां सब उल्टा हो रहा है।
आनंद, छात्र।
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लोगों ने अपनी भूमि बच्चों को रोजगार मिल सके इसलिए दी थी। लेकिन रोजगार की बजाय लोगों को जहरीला धुआं तोहफे में मिल रहा है। कारखानों के धुआं व्यक्ति के शरीर पर बहुत खतरनाक प्रभाव डाल रहा है।
-सुनील कुमार, चिकित्सक।
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जमीन होती तो खेती करके गुजारा कर लेते, लेकिन अब न तो खेती की जमीन है और न ही रोजगार है। आलम यह है कि बेरोजगारी के साथ साथ उन्हें कारखानों का जहरीला धुआं मिल रहा है। इस धुएं के कारण उनके गांव में अनेक बुजुर्ग सांस की बीमारी की चपेट में आ चुके हैं।
इंद्र ,विद्यार्थी।
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औद्योगिक क्षेत्र की फैक्ट्रियों से निकल रहे धुअें से लोगों में सांस के अलावा टीबी की बीमारी भी हो रही है। धुएं से बचाव के लिए लोग अपने घरों को बंद रखते है। इसके अलावा पशुओं के चारे को भी ढक कर रखना पड़ता है।
-चौधरी हिम्मत सिंह, ग्रामीण।
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क्षेत्र की फैक्ट्रियों के धुएं से ग्रामीणों का जीना दुश्वार हो रहा है। आलम यह है कि ग्रामीण बीमारी की चपेट में आ रहे है। लोगों को टीबी व सांस की बिमारी होने लगी है। यह समस्या वृद्ध लोगों में ज्यादा हो रही है।
-रामरतन,ग्रामीण।
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कारखानों के धुएं से करीब एक दर्जन गांवों के लोगों का जीना मुहाल हो रहा है। लोगों ने प्रशासन से कई बार शिकायत की है, लेकिन अधिकारियों पर इसका कोई असर नहीं होता। रोजाना फैक्ट्रियों की चिमनियों जहरीला धुआं छोड़ रही है। बावजूद इसके अधिकारी मौन साधे हुए हैं।
भागमल, ग्रामीण।
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क्या कहते है अधिकारी-
वैसे तो प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड समय समय पर ऐसी इकाइयों के खिलाफ कार्यवाही करता रहता है। कई कारखानों को नोटिस भी जारी किए गए हैं। यदि कोई ग्रामीण किसी कारखाने के बारे शिकायत देता है तो उसके खिलाफ भी कार्यवाही की जाएगी।
-नवीन गुलिया, क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी, धारूहेड़ा।