आज कारगिल दिवस है। आज से ठीक सत्रह साल पहले देेश के 537 रणबांकुरों ने अपनी शहादत देकर कारगिल को बचाया था। इन रणबांकुरों में दो जवान रेवाड़ी के भी हैं। इनकी शहादत को कभी नहीं भुलाया जा सकता। आज भी जब गांवों में इनका नाम लिया जाता है तो गर्व से सीना फूल जाता है। अमर उजाला के संवाददाता चरण सिंह एवं जगदीश यादव ने इस विशेष दिवस पर यह रिपोर्ट बनाई है।
कारगिल के प्रथम शहीद थे सुखबीर सिंह
जिले के गांव धामलावास निवासी सुखबीर सिंह यादव सन 1986 में बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स की 171 बटालियन में बतौर असिस्टेंट कमांडेंट भर्ती हुए। इनके पिता रघुबीर सिंह भी कैप्टन थे। सुखबीर ने देश की सीमा से सटे लगभग सभी राज्यों में अपनी बेहतरीन सेवाओं का प्रदर्शन किया। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड मानेसर में भी 6 वर्ष बतौर स्पेशल कमांडो उन्होंने अपनी सेवाएं दी। सन 1999 में भारत-पाक के बीच सीमा पर गहमा-गहमी का माहौल बढ़ता देख उन्हें कारगिल सीमा पर भेज दिया गया। 26 मई 1999 को वे अपने 6 जवानो के साथ कारगिल सीमा स्थित अल्फा टीकरी कॉम्पलेक्स एडम बेस 26 पर अन्य जवानों व स्थिति का जायजा लेने के लिए निकले थे। जबकि यह काम पैट्रोलिंग पार्टी के अफसर का था, लेकिन उन्हें कुछ गोलीबारी होने का आभास हुआ। इसीलिए वे तुरंत अपने जवानो की पोजिशन देखने के लिए बेस कैंप के लिए अपनी जीप में रवाना हुए। जैसे ही वे सीमा स्थित करकितचु नाले के समीप पहुंचे तो बॉर्डर पार चुके दुश्मनो ने पूरी टीम पर तोप से गोरीबारी शुरू कर दी। जवाब में कमांडेंट सुखबीर सिंह व उनके जवानो ने दुश्मनो का मुंह तोड़ जवाब दिया तथा आखिरी दम तक लड़ते रहे। अंत में कमांडेंट सुखबीर सिंह को अधिक गोली लगने से वे वीरगति को प्राप्त हुए व कारगिल विजय ऑपरेशन के प्रथम शहीद कहलाए।
नाम सुनते ही भर आती हैं आंखे:
उप कमांडेंट सुखबीर सिंह यादव की पत्नी व पूर्व सांसद डॉ सुधा यादव आज भी पति की गाथा का जिक्र होते ही भावुक हो जाती हैं। पत्नी डॉ सुधा यादव वैसे तो अपने एक बेटे व बेटी के साथ अच्छा पारिवारिक जीवन यापन कर रही हैं। जहां एक ओर वे अपनी पति की शहादत पर फक्र से सर ऊंचा करती हैं, वहीं नम आंखों से उनकी कमी को भी महसूस करती है।
मुख्य द्वार दिलाता है रियल हीरो की याद
गांव धामलावास के ग्रामीण व पूर्व सांसद डॉ सुधा यादव ने कारगिल विजय के पहले हीरो उप कमांडेंट सुखबीर सिंह की स्मृति को हर पर जीवंत रखने के लिए गांव की मुख्य सड़क और मुख्य द्वार का नामकरण अमर शहीद सुखबीर सिंह के नाम से किया। इसी के जोहड़ के समीप उनकी भव्य स्मारक भी बनवाई हुई है। उनकी पुण्यतिथि पर नेता-मंत्री व तमाम प्रशासनिक अधिकारी कारगिर हीरो को श्रद्धांजलि अर्पित करने आते हैं। आज प्रदेश स्तर पर यदि धामलावास गांव की पहचान बनी है, तो उसके पीछे केवल उप कमांडेंट सुखबीर सिंह की शहादत है।
कारगिल शहीद सूबेदार रामनिवास युवाओं के प्रेरक
कोसली उपमंडल के गांव बास निवासी सूबेदार रामनिवास को पूरा जिला व गांव कारगिल युद्ध में उनके अदम्य साहस व शहादत के लिए जानते हैं। सुबेदार रामनिवास 1980 में 9 राजपूताना राईफल में बतौर सिपाही भर्ती हुए। ऑपरेशन कारगिल में वे अपनी बटालियन के साथ बर्फीली पहाड़ी पर दुश्मनों से लोहा लेते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। पहाड़ पर बर्फ अधिक होने के कारण उनका शव भी पांच दिनों बाद मिला था। शहीद रामनिवास के बेटे भूपेंद्र का कहना है कि उन्हें पिता का शव 5 अगस्त 1999 को सुपुर्द किया गया था। इसी दिन को वे उनकी पुण्यतिथि के रूप में मनाते हैं।
पत्नी ने याद में बनवाया स्मारक
कारगिल हीरो सूबेदार रामनिवास की याद में पत्नी फूलवती ने उनकी याद में गांव में एक स्मारक बनवाया था। आज स्मारक के पास से गुजरने वाला हर व्यक्ति शहीद रामनिवास की शहादत को याद करता है। गांव के युवा उन्हें अपना प्रेरक मानते हैं और सूबेदार की तरह ही देशसेवा के लिए अपनी जान देने का संकल्प लिए बैठे हैं। सुबेदार रामनिवास के घर में पत्नी फूलवती के अलावा उनका एक बेटा व बेटी है। घर का भरण-पोषण पेंशन के सहारे ही होता है तथा लड़का भूपेंद्र खेती-बाड़ी कर घर का गुजारा कर रहा है।