डॉ. कविता अपने सभी भाई-बहनों की सफलता के पीछे मां की मेहनत और उनके त्याग को मानती हैं।
रेवाड़ी। हमारी मां ने अनपढ़ होकर भी अपने पांच बेटियों और दो बेटों को कामयाब बनाया। खुद भूखे रहकर और समाज से टक्कर लेकर उनको लायक बनाया।
आज इनमें से एक बेटी डॉक्टर, एक लेक्चरर और एक प्रिंसिपल हैं। वहीं दो भाइयों में से दिल्ली बिजली निगम में एक्सईएन और एक अन्य बिल्डिंग कांट्रेक्टर हैं।
डॉ. कविता अपने सभी भाई-बहनों की सफलता के पीछे मां की मेहनत और उनके त्याग को मानती हैं। मदर्स-डे पर अमर उजाला से बातचीत में डॉ. कविता गुप्ता की आंखें मां के नाम पर नम हो गईं। उन्होंने बताया कि उनकी मां पुष्पा गुप्ता एक अनपढ़ महिला हैं। पांच बेटियां होने पर उनके परिवार को अन्य परिवार वालों ने अलग कर दिया। पिता छोटा-मोटा काम करते थे।
मां ने कभी हिम्मत नहीं हारी। पांच बहनों में तीसरे नंबर की डॉ. कविता बताती हैं कि जब होश संभाला तो पिता मानसिक संतुलन खो बैठे थे। मां को ना पीहर का सहारा था और ना ही ससुराल का। मां का एक ही सपना था कि किसी तरह अपने बच्चों को कामयाब बनाए। उन्हीं में अपना जीवन देख संघर्षों के बावजूद मां ने हिम्मत नहीं हारी। बच्चों को पढ़ाने के लिए दिन में टिफिन सेंटर चलाया तो देर रात सिलाई करती रहीं। बच्चे भी अपनी मां का हाथ बंटाते। डॉ. कविता गुप्ता ने कहा कि इतना कुछ करने के बाद भी परिवार का खर्चा पूरा ही नहीं होता था। सभी भाई-बहन पढ़ने में बहुत अच्छे थे। मेडिकल में प्रवेश तक कविता ने ट्यूशन कर अपनी पढ़ाई के पैसे जुटाए। बहनें जब बड़ी होने लगी तो मां को शादी की चिंता सताने लगी। मां की केवल यही तमन्ना थी कि जिस तरह उन्होंने संघर्ष किया है उसी तरह उनकी बेटियों को परेशान नहीं होना पड़े। इसी कारण आज सभी अपनी मेहनत के बल पर खुश हैं।