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महत्व खोता जा रहा बताशा उद्योग

Mon, 23 Nov 2015 01:32 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला रेवाड़ी
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धारूहेड़ा। शगुन का कोई भी अवसर बताशे के बिना अधूरा ही रहता है। लेकिन अनऑर्गेनाइज्ड होने के कारण इसका कारोबार सिमटता जा रहा है। राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-8 पर होने के कारण धारूहेड़ा का बताशा भी लोकल मार्केट के साथ दिल्ली-अलवर तक अपनी पहचान रखता था। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव में भगत सिंह चौक के निकट सैकड़ों की संख्या में बताशा निर्माताओं की संख्या अब महज पांच से छह रह गई है। दूर दराज तक माल सप्लाई होता था लेकिन सुविधा और प्रोत्साहन न मिलने से कारोबारियों ने अपना धंधा बदलना शुरू कर दिया।
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- मशहूर है बताशे वाली गली
भगत सिंह चौक स्थित राव शिवदीप सिंह मार्केट में बताशे बनाने का कारोबार शुरू हुआ था। धीरे-धीरे वहां पर बताशे बनाने वालों की अनेक दुकानें खुल गई। कारोबार इतना बढ़ा कि गली का नाम ही प्रसिद्ध होकर बताशे वाली गली हो गया। हालांकि आज यहां कारोबार के नाम पर चंद दुकानें ही हैं।
आधुनिकता बढ़ी, मांग घटी
जैसे जैसे शहर मे विकास की गति आगे बढ़ती गई, उसी तेजी से बताशा उद्योग में निराशा छाती चली गई। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि बढ़ती हुई आधुनिकता के कारण लोगों में मांग कम होती चली गई। एक समय था जब त्यौहारों पर बताशे वाली गली में रौनक लगी रहती थी। किसी भी निर्माता और व्यापारी को फुर्सत तक नहीं मिला करती थी। आज रुझान बदलने से बताशे का स्थान मिठाइयों ने ले लिया है, इससे उद्योग को झटका लगा है।
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कारीगर बेरोजगार, प्रशासन से मदद नहीं
बताशा उद्योग के लगातार गिरते रहने के कारण अधिकतर कारीगर बेरोजगार हो गए हैं। काम न होने के कारण उनकी आजीविका पर संकट आ गया है। ऐसे मे प्रशासन से भी उनको कोई मदद नहीं मिल पा रही है। लोगों का कहना है कि अगर प्रशासन उनकी मदद करें तो उनका कारोबार आगे बढ़ सकता है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो बताशा कारोबार लुप्त हो जाएगा।

समस्याएं:
1. बताशा उद्योग के लिए अलग से कोई सेक्टर नहीं
2. गलियों में चल रहे इसके कारखानों तक बाहरी वाहन नहीं पहुंच पाते
3. सरकार की ओर से मदद नहीं मिल रही

समाधान:
1. सरकार की ओर से मदद मिले
2. सरकार द्वारा बाजार मुहैया कराया जाए
3. नया सेक्टर विकसित किया जाए

वर्जन
हमारा परिवार सन 1986 से बताशे बना रहा है। लेकिन अब काम में भारी कमी आ गई है। लोग अब मिठाइयों को ज्यादा पसंद करने लगे हैं। ऐसे में कारोबार अब घाटे का सौदा साबित हो रहा है। सरकार मदद करे तो काफी हद तक यह उद्योग बढ़ सकता है। - बाबू लाल, बताशा निर्माता

लोग आधुनिकता के चलते बताशों का महत्व भूल गए है। इसलिए बताशों की बिक्री में भारी कमी आई है। अब तो और किसी काम की तलाश करनी पड़ेगी ताकि जीवन का भरण पोषण किया जा सके। सरकार को चाहिए कि वे बताशा बाजार मुहैया कराए। - रतन सिंह, बताशा निर्माता
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