बिजली समस्या को लेकर जाम लगाने के दौरान सड़क पर बैठे ग्रामीण।
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पिछले दो महीने से बिजली समस्या से परेशान खालेटा, मायण व धवाना के ग्रामीणों का सब्र का बांध उस समय टूट गया, जब शनिवार की रात्रि 9 बजे के करीब भारी संख्या में ग्रामीण में बुड़ौली पॉवर हाउस पहुंचे और रेवाड़ी-महेंद्रगढ़ सड़क मार्ग जाम कर दिया। ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारी चैन की नींद सोये और ग्रामीण बिना बिजली के पूरी रात जाग काटे। दो घंटे तक कोई भी बिजली बोर्ड का अधिकारी वहां नहीं पहुंचा। जाम की सूचना मिलते ही डहीना चौकी भारी पुलिस के साथ वहां पहुंचे, लेकिन ग्रामीण जाम खोलने को टस से मस नहीं हुए।
खंड खोल क्षेत्र के गांव खालेटा, मायण व धवाना में दो महीने से बिजली की समस्या बनी हुई है। कभी आती है तो कभी चली जाती है। रात्रि को बच्चों का सोना दूभर हो गया है। जिला उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा जा चुका है, सीएम विंडो में शिकायत की जा चुकी है, उसके बाद बड़ौली पॉवर हाउस के एसडीओ की नींद नहीं खुली है और उनका रवैया वैसा ही रहा जो दो महीने पहले था। बिजली नहीं आने से परेशान तीनों के ग्रामीणों का सब्र का बांध टूट गया और शनिवार की देर रात 9 बजे के करीब भारी संख्या में ग्रामीण बुड़ौली पॉवर हाउस पहुंचे और जाम लगा दिया। जाम लगने से यातायात ठप्प हो गया। जाम की सूचना मिलते ही डहीना पुलिस चैकी प्रभारी बहादु सिंह मौके पर पहुुंचे और ग्रामीणाें से सड़क से हटने की गुहार की, लेकिन ग्रामीण टस से मस नहीं है। जाम लगा रहे ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारी चैन की नींद सोये और हमारे बच्चे बिना बिजली के पूरी रात जाग काटे। इससे अच्छा तो हम पूरी रात सड़क पर बैठ कर बिता लेंगे। दो घंटे तक कोई भी बिजली कर्मचारी वहां नहीं पहुंचा। रात्रि 11 बजे तक ग्रामीण सड़क पर बैठे रहे। इसके बाद मौके पर पहुंचे खोल थाना प्रभारी संजय कुमार ने आश्वासन के बाद बाद ग्रामीणों ने जाम खोला। इस दौरान 2 घंटे यातायात प्रभावित रहा।
खालेटा के सरपंच सतरूप ने बताया कि गांव में दो महीने से बिजली समस्या बनी हुई है। कभी आती है तो कभी चली जाती है। रात्रि को बिजली आती ही नहीं है। जब बुड़ौली पॉवर हाउस में सम्पर्क किया जाता है तो यह कह कर टरका दिया जाता है कि लाइन में फाल्ट है। ग्रामीणाें ने जो फैसला आज लिया है, वो उनकी मजबूरी है। जब पूरी रात बिजली नहीं आएगी तो बच्चे सो नहीं पाते है, पढ़ नहीं पाते है। पानी की समस्या बनी हुई है। जब ग्रामीणों को ठोस आश्वासन नहीं मिल जाता है, तब तक ग्रामीण सड़क पर बैठे रहेंगे, चाहे इसके लिए पूरी रात ही क्यों न बैठना पड़े।