उठो रे राष्ट्र के शिल्पी! नियति तुमको बुलाती है,
तुम्हारी ही एक उंगली, आज इतिहास लिखाती है।
न ये केवल बटन है, न ये कोई खेल सत्ता का,
यह निर्णय है तुम्हारे, नगर की कल की व्यवस्था का।
वीर-प्रसूता रेवाड़ी की, धरा का मान याद बने,
धारूहेड़ा के कंठों की, प्यास की फरियाद सुने।
गंदगी के जो ढेरों में, हमारे शहर घुटते हैं,
भ्रष्ट प्रपंच में देखो, विकास के स्वप्न लुटते हैं।
प्रलोभन के जो प्याले हों, उन्हें तुम आज ठुकरा दो,
नशे नोट की ताकत को, अपनी वोट से धूल चटा दो।
जाति के संकीर्ण कोटरों, से बाहर आज आना तुम,
चरित्र और योग्यता को ही, अपनी ढाल बनाना तुम।
डिग्रियां तो महज कागज, जो दफ्तर में सजी होंगी,
बिना शुचिता के सब बातें, यहां बिल्कुल अनसुनी होंगी।
शिखर वो है जो संकट में, प्रजा के साथ खड़ा होवे,
वो चेयरपर्सन, वही पार्षद, जन-जन का ही सगा होवे।
यही तो वक्त है अर्पण, तुम्हारे श्रेष्ठ चिंतन का।
तुम ही भाग्यविधाता हो, तुम ही इस युग के नायक हो,
चुनो उसे जो सच में, इस नगर के ताज के लायक हो।
कलम की धार से मैंने, तुम्हें स्वर आज दे डाला,
अब तुम्हारे हाथ में है, भविष्य की सुंदर माला।
जागो रे मतदाता! तुम ही हो भाग्यविधाता।
मनोज वशिष्ठ , शिक्षाविद साहित्यकार, सावित्री सदन विकास नगर