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5 ग्राम तेल में कैसे मिलेगी नौनिहालों को पूरी-सब्जी.

Fri, 09 Sep 2016 12:59 AM IST
ब्यूरो /अमर उजाला
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केंद्र सरकार हिमाचल में ऑटोमेटिड एसएमएस योजना शुरू करने जा रही है।
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नौनिहालों को पौष्टिक आहार मुहैया कराने के लिए राज्य सरकार की ओर से बना खाद्य सामग्री का रेशो खुद सवालों के घेरे में है। मध्याह्न भोजन योजना(मिड-डे मील) के अंतर्गत जिले के प्राथमिक स्कूलों में बच्चों के लिए पकाए जाने वाले खाने में रोजाना प्रति बच्चा पांच ग्राम तेल स्वीकृत है।
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बड़ी बात यह है कि रोजाना के अलग-अलग डाइट चार्ट में सब्जी-पूरी भी शामिल है। ऐसे में प्रति बच्चा 5 ग्राम में सब्जी और फिर पूड़ी कैसे बनेगी, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। इससे पहले भी गलत रेशो के चलते सरकार की नौनिहालों के लिए खीर की योजना बंद हो चुकी है। तब 60 ग्राम दूध में 100 ग्राम चावल खीर के लिए तय किया गया था।

चार दिन चावल और दो दिन गेहूं आधारित व्यंजन
स्कूल में पढने आने वाले स्टूडेंट्स के लिए सप्ताह में चार दिन चावल आधारित व्यंजन हैं, जबकि दो दिन रोटी आधारित व्यंजन मिड-डे मील में शरीक हैं। गेहूं आधारित व्यंजन में मिस्सी रोटी और मौसमी सब्जी, आटे का हलवा और काले चने, रोटी और दाल घिया या कद्दू की सब्जी, मीठा दलिया, गेहूं, सोया पूरी और सब्जी हैं। वहीं चावल आधारित व्यंजन में सब्जियों का पुलाव, पौष्टिक खिचड़ी, दाल चावल, कढ़ी-पकौड़ा और चावल, चावल और काला या सफेद चना आलू के साथ दिया जाना मेन्यू में हैं।
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कैसे होगी ईमानदारी से भोजन देने की जांच
राजस्थान सरकार में जहां प्रति दिन के लिहाज से प्रतिदिन के लिहाज से स्पेसिफिक मेन्यू तय है। वहीं प्रदेश सरकार में मेन्यूू तो तय है लेकिन किस दिन क्या बनना है, यह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में बच्चों को लगातार क्या परोसा जा रहा है, इसका पता औचक निरीक्षण करने के बावजूद पक्के तौर पर पता नहीं किया जा सकता। सरकार की ओर से अब 1 नवंबर से स्कूल में पढने आने वाले बच्चों के लिए रोजाना दूध देने की योजना की तैयारी है। ऐसे में सरकार की प्रति बच्चा दूध की योजना को ठीक ढंग से अमलीजामा पहना पाएगी या नहीं।

अध्यापक भी मानते हैं कम है तेल की मात्रा
जैतड़ावास और जाटूवास स्कूल के अध्यापक या मिड-डे मील इंचार्ज भी मानते हैं कि मिड-डे मील में बच्चों के लिए गेंहू और चावल की सौ-सौ ग्राम मात्रा ठीक है, छोले की मात्रा भी 80 ग्राम ठीक है। लेकिन पांच ग्राम तेल अपर्याप्त है, खासकर तेल-पूरी में। साथ ही यह भी कहते हैं कि इससे पहले खीर में गलत रेशो ही बंद होने का कारण बना था।

सीन नंबर-1राजकीय प्राथमिक स्कूल, जाटूवास
जाटूवास स्थित राजकीय प्राथमिक स्कूल में 50 बच्चे पढ़ाई करते हैं। इनके लिए हेड मिस्ट्रेस समेत दो टीचर हैं। जबकि दो ट्रेनिंग प्राप्त कर रहे टीचर यहां शिक्षा देते हैं। मिड-डे मील की जांच करने के लिए अमर उजाला टीम पहुंची तो यहां सफेद छोले और चावल बन रहे थे। चेक करने पर चावल और छोले ठीक मात्रा में बनते दिखे। वहीं गेहूं और चावल का स्टॉक भी था।

सीन नंबर-2राजकीय माध्यमिक विद्यालय, जैतड़ावास
जैतड़ावास स्थित स्कूली बिल्डिंग में प्राथमिक और माध्यमिक दोनों की कक्षाएं लगती हैं। यहां मिड-डे मील में सब्जियों का पुलाव बन रहा था। दोपहर करीब 12 बजे बच्चे हाथ धोकर खाना खाने में जुट गए। रसोई की स्थिति ठीक थी ही, साथ में खाने में पड़ने वाली सब्जियां भी ताजी और अच्छी क्वालिटी की दिखीं।
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मिड-डे मील में खाद्य सामग्री की मात्रा का निर्धारण सेंटर से होता है। इसमें लोकल एडमिनिस्ट्रेशन लेवल से कुछ नहीं किया जा सकता। वहीं स्कूलों में अध्यापकों के साथ मिलकर बेहतर खाद्य सामग्री मुहैया कराने के लिए लगातार प्रयास किया जाता है। इसके साथ ही समय-समय पर स्कूलों का निरीक्षण किया जाता है।
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