रेवाड़ी। क्रिकेटर विकास यादव की तीन साल पांच महीने की कानूनी लड़ाई सफल रही। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश विकास गुप्ता की अदालत ने हरियाणा खेल एवं युवा कार्यक्रम विभाग को झटका दिया। अदालत ने जिला खेल एवं युवा कार्यक्रम अधिकारी की अपील खारिज कर दी।
निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए विकास यादव को ग्रेड-बी खेल प्रमाणपत्र जारी करने का निर्देश दिया गया। जौनावास निवासी विकास यादव ने वर्ष 2018 में सिविल अदालत में दावा दायर किया था। वह वर्ष 2017-18 में महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के छात्र रहते हुए उत्तर क्षेत्र विश्वविद्यालय क्रिकेट टीम के सदस्य थे। इस टीम ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) द्वारा आयोजित विज्जी ट्रॉफी एकदिवसीय घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिता 2017-18 का खिताब जीता था। बीसीसीआई ने विजेता टीम के खिलाड़ियों को प्रमाणपत्र भी जारी किए थे। हरियाणा सरकार की 15 नवंबर 2018 की खेल ग्रेडेशन अधिसूचना के अनुसार, यह प्रतियोगिता श्रेणी-9 में आती है। इस श्रेणी के विजेता खिलाड़ियों को ग्रेड-बी प्रमाणपत्र मिलना चाहिए। हालांकि, खेल विभाग ने उन्हें केवल ग्रेड-डी प्रमाणपत्र के योग्य माना था।
अदालत ने हरियाणा सरकार की 15 नवंबर 2018 की अधिसूचना का विस्तृत परीक्षण किया। अधिसूचना के अनुसार, बीसीसीआई द्वारा आयोजित घरेलू एकदिवसीय क्रिकेट प्रतियोगिताएं श्रेणी-9 में आती हैं। इन प्रतियोगिताओं की विजेता टीम के सदस्य ग्रेड-बी प्रमाणपत्र के पात्र होते हैं। खेल विभाग के गवाह ने भी विज्जी ट्रॉफी के बीसीसीआई द्वारा आयोजन और प्रस्तुत प्रमाणपत्र की सत्यता स्वीकार की। करीब साढ़े तीन वर्ष की सुनवाई के बाद, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश विकास गुप्ता ने 21 जुलाई 2026 को खेल विभाग की अपील खारिज कर दी।
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खेल विभाग की दलीलें
खेल विभाग ने अदालत में दलील दी कि खिलाड़ी का दावा ग्रेड-डी के अंतर्गत आता है। विभाग ने बीसीसीआई से खिलाड़ी के नाम और प्रमाणपत्र के सत्यापन की जानकारी मांगी थी। यह जानकारी लंबे समय तक प्राप्त नहीं हुई थी। इसलिए ग्रेड-बी प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जा सका।