रेवाड़ी। जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने प्लॉट खरीदारों के हित में फैसला सुनाते हुए बिल्डर कंपनी को बड़ा झटका दिया है। आयोग ने स्प्रिंगवुड्स सिटी परियोजना से जुड़े छह खरीदारों को प्लॉट का कब्जा देने, सेल डीड निष्पादित करने, जमा राशि पर ब्याज देने और प्रत्येक शिकायतकर्ता को तीन-तीन लाख रुपये मुआवजा देने के आदेश जारी किए हैं।
अधिवक्ता कैलाश चंद ने बताया कि यह फैसला 6 मई को पीठासीन सदस्य राजेंद्र प्रसाद और सदस्य मुकेश शर्मा की बेंच ने पारित किया। आयोग के समक्ष अनु धीमान, नीतू रानी, सनेह लता, बुद्धि प्रकाश, नरेश कुमार और सुरेंद्र कुमार ने अलग-अलग शिकायतें दायर की थीं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि उन्होंने धारूहेड़ा स्थित स्प्रिंगवुड्स सिटी परियोजना में प्लॉट बुक करवाए थे और कंपनी की मांग अनुसार लाखों रुपये जमा करवा दिए थे लेकिन वर्षों बाद भी न तो प्लॉट का कब्जा दिया गया और न ही रजिस्ट्री की गई।
शिकायतकर्ताओं ने आयोग को बताया कि कंपनी ने दो वर्ष के भीतर कब्जा और कन्वेयंस डीड देने का वादा किया था लेकिन समय बीतने के बावजूद कंपनी लगातार टालमटोल करती रही। परेशान होकर खरीदारों ने कानूनी नोटिस भेजे और पुलिस प्रशासन व सीएम विंडो में भी शिकायतें दीं।
सुनवाई के दौरान आयोग के सामने यह तथ्य भी आया कि परियोजना की भूमि से जुड़ा विवाद अदालत में लंबित था और उच्च न्यायालय की ओर से उस पर स्थगन आदेश लागू था। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि जब भूमि विवादित थी और उस पर रोक लगी हुई थी, तब खरीदारों से भुगतान मांगना और बाद में प्लॉट रद्द करने के पत्र जारी करना पूरी तरह अनुचित और मनमाना कदम था।
कंपनी सेवा देने में विफल रही
आयोग ने माना कि शिकायतकर्ताओं ने कंपनी को लगभग पूरी राशि अदा कर दी थी लेकिन कंपनी सेवा देने में विफल रही। आयोग ने कंपनी द्वारा जारी रद्दीकरण पत्रों को अवैध घोषित करते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही कंपनी को 45 दिनों के भीतर संबंधित प्लॉट का कब्जा सौंपने और एग्रीमेंट के अनुसार कन्वेयंस डीड तथा सेल डीड निष्पादित करने के निर्देश दिए। आयोग ने जमा राशि पर शिकायत दायर करने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश भी दिया है। आयोग ने प्रत्येक शिकायतकर्ता को मानसिक पीड़ा, आर्थिक नुकसान और उत्पीड़न के लिए 3-3 लाख रुपये मुआवजा तथा 22-22 हजार रुपये मुकदमा खर्च देने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय के भीतर आदेश का पालन नहीं किया गया तो शिकायतकर्ता उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 71 के तहत कार्यवाही शुरू कर सकते हैं। वहीं धारा 72 के तहत कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी संभव होगी।