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50 दिन पूरे होने को, न हुए कैशलेस और ना मिल रहा पूरा कैश

Mon, 26 Dec 2016 11:41 PM IST
ब्यूरो /अमर उजाला
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एटीएम के बाहर लगी लाइन - फोटो : अमर उजाला
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नोटबंदी के 50 दिन पूरे होने को है, लेकिन कैश की किल्लत कम होने का नाम ही नहीं ले रही। हालांकि बैंकों में ग्राहकों को कुछ हल्की राहत मिल रही है। लेकिन एटीएम बूथों पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। स्थिति यह है कि वर्तमान में उपभोक्ता न तो कैशलेस ट्रांजक्शन कर पा रहा है और ना ही उसके पास जरूरी खर्चे तक के लिए पर्याप्त कैश है। बैंक प्रबंधक एक ओर स्वैप मशीनों के ऑर्डर पूरे होने में 20 से 25 दिन का समय लगने की बात कहते हैं, तो दूसरी ओर उपभोक्ताओं को पर्याप्त कैश भी उपलब्ध नहीं करा पा रहे हैं।
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बैंकों में हल्की राहत, पर्याप्त कैश नहीं
नोटबंदी के 48 दिन बाद बैंकों में कैश को लेकर हल्की राहत जरूर मिली है, लेकिन उपभोक्ताओं को पर्याप्त कैश नहीं मिल पा रहा है। बैंक में पहुंच रहे उपभोक्ता बैंककर्मियों की ओर से निर्धारित विड्रॉल सीमा के हिसाब से कैश निकासी कर रहे हैं, न कि अपनी इच्छानुसार। जिलेभर की किसी भी बैंक शाखा में एक भी उपभोक्ता को 24 हजार रुपये की निकासी नहीं मिल पा रही है। हालांकि जिन उपभोक्ताओं ने नई करेंसी बैंक खाते में जमा कराई थी, उन्हें जमा कराई राशि के अनुसार कैश निकासी की छूट जरूर मिल रही है।

एटीएम मशीनें बनीं शोपीस
नोटबंदी के बाद जो हाल एटीएम मशीनों का हुआ है, शायद ही ऐसी स्थिति पहले कभी देखी गई हो। जिलेभर के 174 एटीएम मशीनों में से केवल 65 एटीएम मशीनें ही नियमित रूप से संचालन में हैं। इसके अलावा कुछ मशीनें खराब पड़ी हैं, तो कुछ आउट ऑफ कैश हैं। वहीं कुछ मशीनों में सप्ताह-दस दिन में एक-दो बार ही कैश मिल पाता है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 50 दिन बाद सब ठीक हो जाने वाली बात गलत रास नहीं आ रही।
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स्वैप मशीन मिले, तो व्यापार चले
जिलेभर से 1200 से अधिक व्यापारियों ने अपनी संबंधित बैंक शाखा में पीओएस मशीन के लिए आवेदन किया हुआ है। लेकिन बैंककर्मी स्वैप मशीन उपलब्ध कराने में अक्षमता दिखा रहे हैं। ऐसे में व्यापार पूरी तरह प्रभावित है। व्यापारियों का कहना है कि वे अपनी सारी दुकानदारी कैशलेस करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मशीनें तो उपलब्ध हों। इसी के चलते डेबिट-क्रेडिट कार्ड लेकर बाजार पहुंचने वाले ग्राहक खाली हाथ घर लौट रहे हैं।

नए वर्ष में सरकारी कार्यालयों में लगेंगी स्वैप मशीनें
जिला प्रशासन और जिला अग्रणी बैंक के दिशा-निर्देशन में कैशलेस अभियान जोरो-शोरों से चल रहा है। लेकिन अभी सरकारी कार्यालयों में स्वैप मशीनें नहीं पहुंची हैं। उम्मीद है नए वर्ष की शुरुआत में ही लगभग सभी सरकारी दफ्तरों में स्वैप मशीनें लग जाएंगी। सीटीएम बिजेंद्र सिंह हुड्डा ने बताया कि सरकारी कार्यालयों की डिमांड के अनुसार कुल 275 स्वाइप मशीनों के ऑर्डर दिए गए हैं। हरियाणा सरकार ने एसबीआई बैंक के साथ मशीनें उपलब्ध कराने को लेकर डील की है। जनवरी के पहले सप्ताह से दफ्तरों में मशीनें लगनी शुरू हो जाएंगी। कर्मचारियों को स्वैप मशीन ऑपरेटिंग को लेकर विशेष प्रशिक्षक ट्रेनिंग भी दे रहे हैं। मशीन लगने के तुरंत बाद बड़े ही इजी वे में कैशलेस प्रणाली के तहत सरकारी फीस, भुगतान किया जा सकेगा।

वर्जन
एक तरफ सरकार कहती है कि डिजिटल इंडिया बनाना है, लोगों को कैशलेस करना है। दूसरी ओर बैंकों में स्वाइप मशीनें उपलब्ध नहीं हैं। यदि कैशलेस प्रणाली में समय लगना है, तो उपभोक्ताओं के लिए पर्याप्त कैश की तो व्यवस्था होनी चाहिए। मेरे दुकान पर 70 फीसदी ग्राहक डेबिट कार्ड से सामान खरीदने आते हैं, लेकिन मशीन नहीं है। बावजूद इसके हमने ग्राहकों की सुविधा के लिए पेटीएम ई-वॉलेट से पेमेंट लेने की सुविधा चालू की है। - दीपक कुमार, किरयाना स्टोर, शक्तिनगर
सरकार के 50 दिन भी पूरे होने को आए। लेकिन एटीएम बूथों में कैश की किल्लत में सुधार नहीं आया है। यदि पांच साल और बढ़ा दिए जाएं, तब भी यहां ऐसी ही स्थिति रहेगी। क्योंकि हमारे सिस्टम में ही खराबी है। बैंककर्मी अपने चहेतों और रिश्तेदारों को प्राथमिकता पर पैसा वितरित करते हैं। ऐसे में ना तो आम उपभोक्ता को प्र्याप्त कैश मिलता है और ना ही एटीएम मशीनों में पैसा डल पा रहा है। -मनोज, उपभोक्ता, छीपटवाड़ा
एटीएम मशीनों की माली हालत का सर्वाधिक असर अन्य प्रांतों के कंपनी कर्मचारी व मजदूरों पर पड़ रहा है। इन लोगों की जेबें खाली हैं। इनकी सैलरी केवल बैंक खाते तक ही सिमट कर रह गई है। -सुनील कुमार, ठेकेदार
बैंक शाखाओं में उपभोक्ता कितने परेशान हो रहे हैं। शायद नेता-मंत्रियों को इस बात का अंदाजा भी नहीं है। न तो पेंशनधारकों को उनका पूरा पैसा मिल रहा है और ना ही कैशलेस की दिशा में कुछ खास हो रहा है। मेरा सात महीने का एरियर बैंक में अटका पड़ा है, लेकिन बैंककर्मी बिल्कुल भी सहयोग करने को तैयार नहीं है। -केशुराम नत्थूराम डहीनवाल, सुलखा
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