रेवाड़ी। कभी जिले की पहचान पीतल नगरी के नाम से थी लेकिन मंदी के दौर से गुजर रहे पीतल कारोबार से यह पहचान खोने की कगार पर है। एक जमाने में यहां बने पीतल के बर्तन और शोपीस हर घर की शान बढ़ाते थे। शादी-ब्याह और त्योहारों पर इनकी खरीद परंपरा मानी जाती थी, लेकिन अब पीतल की चमक फीकी पड़ गई है।
जिले में डेढ़ दशक पहले पीतल के कारोबार से 550 परिवार जुड़े थे लेकिन आज 50 कारीगर ही इस कारोबार को जिंदा रखे हुए हैं। कारोबारियों के अनुसार पीतल के बर्तनों की बिक्री अब सिर्फ 15-20 प्रतिशत तक रह गई है। पहले धनतेरस और दिपावली पर हजारों आर्डर रहते थे, जबकि अब कम ग्राहक ही पहुंचते हैं।
करीब 30-40 साल पहले बड़ी संख्या में परिवारों की रोजी-रोटी का साधन यही व्यापार था। पीतल के बर्तन बनाने वाले कारीगरों का कारोबार इस वजह से भी कम हो गया है क्योंकि अब बना बनाया पीतल का बर्तन आने लगा है। कहने को तो ब्रास मार्केट है मगर यहां पर पीतल का कारोबार बहुत कम है।
आज अधिकांश कारीगर मजदूरी, रेहड़ी-ठेले या छोटे-मोटे काम करने लगे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार ट्रेनिंग सेंटर, आधुनिक मशीनें और मार्केटिंग प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए तो यह कारीगरी फिर जीवित हो सकती है।
कारीगरों का कहना है कि आधुनिक तकनीक और मशीनों की कमी, स्टील और क्रॉकरी के सस्ते विकल्पों ने उनके व्यवसाय की नींव हिला दी है। सरकार से अब तक उन्हें ठोस सहयोग नहीं मिला। इस वजह से पारंपरिक पेशा धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर है।
कारीगरों की मांग है कि उन्हें ट्रेनिंग सेंटर, आधुनिक मशीनें और मार्केटिंग प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए जाएं। अगर सरकार और समाज मिलकर पहल करें, तो यह कारीगरी फिर से जीवित हो सकती है और युवा पीढ़ी के लिए रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। संवाद
सरकार से मदद की दरकार
ठठेरा समाज के उपाध्यक्ष श्रीगोपाल ने कहा कि पहले केवल पीतल के बर्तन ही बिकते थे लेकिन अब स्टील और एल्युमिनियम के बर्तनों ने उनकी जगह ले ली है। सरकार पीतल को जीएसटी मुक्त कर मजदूरों को लोन दे ताकि वे अपने पुश्तैनी पेशे से जुड़े रह सकें। करीब 30-40 साल पहले जिले की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने वाला यह व्यवसाय अब धीरे-धीरे खत्म होता नजर आ रहा है। अब 7 माह कार्य चलता है और 5 माह बंद रहता है। कारीगर बच्चों को अपने कार्य में नहीं आने की सलाह देते हैं। ऐसे में युवा इस कार्य से दूर हो रहे हैं। इसी वजह से कारीगरों की संख्या भी घटी है।
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पुश्तैनी पेशा छोड़ने को मजबूर : राज
बर्तन व्यापारी राज ने बताया कि एक समय काम इतना होता था कि दिन-रात मेहनत करनी पड़ती थी। अब पहले जैसी बात नहीं है। सरकार से कभी ठोस सहयोग नहीं मिला। आधुनिक तकनीक और मशीनों की कमी तथा स्टील और क्रॉकरी जैसे सस्ते विकल्पों ने उनके धंधे की नींव हिला दी है।
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पिछले 25 साल में पीतल के दाम :
वर्षपीतल के दाम
2025- 750 प्रति किलो
2020- 370 प्रति किलो
2015- 250 प्रति किलो
2010- 200 प्रति किलो
2005- 180 प्रति किलो
2000- 170 प्रति किलो