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बैंक खुलते ही लग गई कतारें

Mon, 21 Nov 2016 11:43 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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पैसे के लिए मारामारी
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 रविवार की छुट्टी के बाद सोमवार को बैंक खुलते ही बैंकों के बाहर उपभोक्ताओं की भारी भीड़ दिखी। लंबी-लंबी कतारों में खड़े लोग जल्द से जल्द अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे थे। लेकिन बैंकों में कैश को लेकर स्थिति पहले जैसी ही बनी रही। बैंकों में पैसे निकलवाने आए लोगों को या तो कम पैसे मिले या फिर उन्हें बिना पैसे ही लौटना पड़ा। अनाजमंडी स्थित पीएनबी शाखा में पैसे विड्रा करने आ रहे लोगों को केवल 4 हजार रुपए ही दिए जा रहे थे, जबकि एक उपभोक्ता एक दिन में 24 हजार और सप्ताह में 50 हजार रुपए बैंक से निकाल सकता है। बैंककर्मियों से सवाल पूछे जाने पर बताया कि बैंक में कैश की भारी कमी है। इसीलिए निकासी के लिए एक लिमिट तय कर दी है, ताकि सभी उपभोक्ताओं को कुछ पैसे मिल पाए। इसी कड़ी में एसबीआई, आईसीआई, एचडीएफसी, सिंडिकेट, इलाहबाद, यूबीआई सहित अन्य बैंकों में भी कैश को लेकर मारामारी रही।
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एटीएम पर बढ़ा दबाव
कैश निकलवाने को लेकर सबसे अधिक संघर्ष एटीएम मशीनों पर देखने को मिल रहा है। यहां सुबह से लेकर शाम तक पैसे निकासी वालों की भीड़ लगी रहती हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि शहर के 50 फीसदी एटीएम मशीनें या तो आउट ऑफ सर्विस हैं। या इनमें कई दिनों से कैश ही नहीं डला है। ऐसे में अन्य एटीएम मशीनों पर उपभोक्ताओं का दबाव बढ़ रहा है। एसबीआई बैंक के एटीएम बूथ कुछ सुचारू व्यवस्था में है, अन्यथा दूसरे बैंकों की एटीएम मशीनें रामभरोस चल रही हैं।

शादी वालों को भेजा वापिस
सोमवार को शादी का कार्ड लेकर बैंक से 2.5 लाख रुपए निकलवाने पहुंचे शादी वाले उपभोक्ताओं को बैंककर्मियों ने वापस भेज दिया। बैंककर्मियों का कहना था कि सामान्य उपभोक्ताओं के लिए ही कैश की पूर्ति नहीं हो पा रही है। कैश की कमी के चलते 2.5 लाख रुपए एक उपभोक्ता को देना मुश्किल हो रहा है। पीएनबी, आईडीबीआई, इलाहबाद सहित कई बैंक शाखाओं में शादी संबंधी उपभोक्ताओं को बैंक कर्मियों ने वापस भेज दिया।
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खाते में 49 हजार की राशि सबसे अधिक जमा
इन दिनों बैंकों में जिन बूढ़े-बुजुर्गों, महिला व बच्चों के खातों में 49 हजार रुपए की राशि सर्वाधिक जमा हो रही है। दरअसल 50 हजार से कम की राशि में पैन नंबर की आवश्यकता नहीं होती है। ऐसे में कुछ लोग अपने अतिरिक्त पैसों को अपने माता-पिता व बच्चों के खातों में जमा करवा रहे हैं।

रेहड़ीवालों पर पड़ रही नोटबंदी की मार
रेवाड़ी। नोटबंदी के बाद शहर के रेहड़ीवालों के लिए दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल हो गया है। गरीब-मजदूर, किसान, रेहड़ी संचालक आदि पर नोटबंदी का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है। दैनिक दुकानदारी पर निर्भर रेहड़ी संचालकों का धंधा बिल्कुल ठप पड़ा है। फ्रूट विक्रेता मधु देवी की माने तो नोटबंदी के बाद 60 प्रतिशत दुकानदारी घट गई है। मार्केट में सब्जी-फल, दाल-चना आदि की रेहड़ी लगाने वालों का सामान बहुत कम बिक रहा है। इनका कहना है कि 20 दिन पहले ग्राहक जहां एक सप्ताह का सामान खरीदकर ले जाते थे, वहीं अब एक दिन का सामान भी नहीं खरीदते। दूसरी ओर छुट्टे पैसों की समस्या भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। रेहड़ी पर आने वाले लगभग ग्राहक पुरानी करेंसी दिखाते हैं। ऐसे में कई ग्राहकों को मना कर दिया जाता है।

पहले नप ने हटाया, अब नोटबंदी की मार
रेहड़ी संचालकों का कहना है कि पहले ही नप कार्रवाई से परेशान रेहड़ी संचालकों की रोजी-रोटी संकट में है। रेहड़ीवालों को स्थाई जगह नहीं मिल रही है। दूसरा नोटबंदी की मार अब रेहड़ीवालों पर भारी पड़ रही है।

नोट एक्सचेंज का भी नहीं मिला लाभ
शहर में लगभग मजदूर, झुग्गी-झोपड़ी वाले व रेहड़ी संचालकों के बैंक में खाते नहीं हैं। ये लोग रोज कमाने, रोज खाने की सोच के साथ जीते हैं। ऐसे में नोटबंदी के बाद इन्हें नोट एक्सचेंज का भी लाभ नहीं मिला। नोट एक्सचेंज की सीमा 4 हजार से घटकार 2 हजार कर दी गई। रेहड़ीवालों का कहना है कि उनका सारा काम छुट्टे पैसों से चलता है। यदि वे नोट एक्सचेंज कराने के लिए बैंक की लाइन में लगते हैं, तो उनकी एक दिन की दुकानदारी खत्म हो जाती है और रुपए भी केवल 2 हजार ही एक्सचेंज हो पाएंगे।
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मैं पिछले 10 सालों से रेवाड़ी में रेहड़ी लगाता हूं। लेकिन इस बार जो बिक्री में गिरावट आई है। ऐसा पहले कभी नहीं देखा। हमारे पास छुट्टे पैसे की अधिक समस्या बन गई है। अब लोग 2 हजार का नया नोट लेकर सामान खरीदने आ जाते हैं, लेकिन इसे छुट्टा करना मुश्किल है।
वाहिद, मूंगफली विक्रेता
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हम रेहड़ीवालों का जीना ही मुश्किल हो गया है। वैसे ही नगर परिषद की कार्रवाई से परेशान हैं और अब जो भी कोई सामान लेने आता है, तो उसके हाथ या तो पुराने नोट होते हैं या फिर नया 2 हजार रुपए का नोट होता है। अब हम छुट्टे कहां से लाएं। घर का गुजारा करना भी मुश्किल हो गया है।
पप्पन देवी, सब्जी विक्रेता
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एक रेहड़ी के सहारे में अपने पांच बच्चों का पेट भर रही हूं। नगर परिषद अधिकारी कभी भी आकर हमें सड़क किनारे से हटा देते हैं। इधर-उधर भागने के चक्कर में सारा व्यापार चौपट हो गया है। दूसरा पुराने नोटों के बंद होने से काम न के बराबर रह गया है।
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मधु देवी, फ्रूट विक्रेता
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