जाट आरक्षण संघर्ष समिति के आह्वान पर पांच जून को आंदोलन शुरू होने से पहले प्रशासन ने जिले में सुरक्षा के तमाम दावे किए,लेकिन पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी महज राणौली-प्राणपुरा तक सिमट कर रह गई।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
जाट आरक्षण संघर्ष समिति के आह्वान पर पांच जून को आंदोलन शुरू होने से पहले प्रशासन ने जिले में सुरक्षा के तमाम दावे किए,लेकिन पुलिस प्रशासन की मुस्तैदी महज राणौली-प्राणपुरा तक सिमट कर रह गई। फरवरी माह में हुए आंदोलन के दौरान जिले की 12 सड़कों पर पर जाम लगाया गया था।
लेकिन इन दोनों स्थानों पर अमर उजाला की पड़ताल के दौरान सुरक्षा तो दूर की बात एक भी पुलिस कर्मी मौजूद नहीं पाया गया। गौरतलब है कि बीते आंदोलन में रूध गांव के पास हाइवे कट वह प्वाइंट था, जिस पर जाटों ने टेंट गाड़कर नेशनल हाईवे नंबर आठ को जाम कर दिया था।
चंदूपुरा एवं रूध गांव के पास सुरक्षा सबसे जरूरी
फरवरी में हुए जाट आंदोलन के दौरान रूध वही प्वाइंट था, जहां पर जाट आंदोलनकारियों ने टेंट लगाकर हाईवे को अपने कब्जे में ले लिया था। वहीं चंदूपुरा गांव और जयसिंहपुर खेड़ा के पास भी पूर्व में हाइवे जाम किया जा चुका है। ऐसे में इन प्वाइंट्स की सुरक्षा बेहद जरूरी है। क्योंकि आंदोलन के दौरान यहां किसी प्रकार की अवांछित गतिविधि होती है तो देश की राजधानी का जयपुर, गुजरात एवं मुंबई से संपर्क टूट जाएगा। गौरतलब है कि राजधीन एवं इन तीन प्रदेशों के बीच यही एक मात्र कामर्शियल गलियारा है। इस पर पुलिस-प्रशासन ने गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कोई भी पुलिस कर्मी यहां तैनात नहीं किया।
रेवाड़ी को राजस्थान से जोड़ता है सुलखा गांव
रेवाड़ी-शाहजांपुर मार्ग रेवाड़ी को राजस्थान से जोड़ता है। इसी मार्ग पर जाट बाहुल्य जाटुवास एवं सुलखा में आंदोलनकारियों सड़क के बीचों-बीच टेंट लगाकर जाम लगा दिया था। राणौली के बाद सुलखा जिले में जाट आंदोलनकारियों का बड़ा केंद्र था। यहां पर पूर्व जिला पार्षद एवं कांग्रेस नेता दलबीर सिंह के नेतृत्व में आंदोलनकारी डटे हुए थे। आम आदमी तो दूर की बात यहां से मीडिया कर्मियों को को भी कवरेज के लिए आगे जाने से रोका जा रहा था। पुलिस-प्रशासन ने अपनी भूल को दोहराते हुए यहां पर भी सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए हैं। विश्वस्त सूत्रों की माने तो आंदोलनकारियों के समर्थन में यहां पर भी धरना शुरू हो सकता है।