सुबह डीसी अंकल से वाहन सुविधा मांगी तो संचालकों ने बच्चों को पहुंचाया थाने
अमर उजाला ब्यूरो
रेवाड़ी।
जिले के गांव रूध, आनंदपुर, गढ़ी, बोलनी, माजरा श्योराज सहित अन्य गांवों के अभिभावक अपने बच्चों के साथ मंगलवार सुबह उपायुक्त कार्यालय पहुंचे। ज्यादातर की शिकायत यह थी कि नियम 134ए में दाखिला पाने वाले बच्चों को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके बाद उपायुक्त ने पहले बच्चों को बुलाया और बगैर अभिभावकों के उनसे बातचीत की। कार्यालय में बच्चों के आने की जानकारी मिलने के बाद उपायुक्त ने उनके लिए फ्रूटी मंगाई। जैसे ही बच्चे उपायुक्त कार्यालय में दाखिल हुए तो सीट में बैठने के साथ ही बच्चों को फ्रूटी दी गई तो बच्चों ने तपाक से कहा कि डीसी अंकल हमें फ्रूटी नहीं बस चाहिए। इसके बाद बच्चे स्कूल पहुंचे। छुट्टी के बाद बच्चों को वाहन की सुविधा उपलब्ध नहीं कराई गई। शिक्षकों ने बच्चों को थाने पहुंचा दिया। वहां से अभिभावक अपने बच्चों को रात आठ बच्चे घर ले गए।
नियम 134ए के तहत प्रवेश लेने वाले बच्चों और अभिभावकों की मुश्किल कम होने का नाम नहीं ले रही है। कई स्कूल संचालकों द्वारा इन बच्चों को न केवल कक्षाओं में अलग से बैठाया जा रहा है अपितु ट्रांसपोर्ट की सुविधा तक नहीं दी जा रही है। निजी स्कूलों की इस मनमानी के खिलाफ मंगलवार को बड़ी संख्या में अभिभावक डीसी कार्यालय पहुंचे और उनको स्कूलों की मनमानी से अवगत कराया। डीसी पंकज कुमार ने इस मामले में जल्द ठोस कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
इसके बाद उपायुक्त ने समस्याएं जानीं तो बच्चों ने बताया कि बावल के साथ रेवाड़ी के कई स्कूल 134ए वाले बच्चों को बस की सुविधा नहीं दे रहे हैं। इन स्कूलों की बसें दूसरे बच्चों को लेकर आती हैं लेकिन उनको बैठाकर नहीं लाती हैं। बच्चों ने बताया कि उनको स्कूल में परेशान भी किया जाता है। डीसी ने सभी बच्चों के अभिभावकों को बुलाया और उनसे समस्याओं के बारे में जानकारी ली। अभिभावकों ने बताया कि निजी स्कूलों द्वारा इतना अधिक मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है कि बच्चे स्कूल जाने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने बताया कि कई स्कूलों में बच्चों को अलग बैठा दिया गया और कई स्कूल तो ऐसे हैं जिन्होंने अभी तक प्रवेश ही नहीं दिया है। अभिभावकों ने कहा कि इससे अच्छा तो दूसरे स्कूलों में प्रवेश दिला दो ताकि प्रतिदिन के चक्कर लगाने से तो बचा जा सके। अभिभावकों ने बताया कि निशुल्क प्रावधान होने के बावजूद भी स्कूल संचालक उनसे विभिन्न मदों के 10 से 20 हजार रुपये भी मांग रहे हैं। उनके बच्चों की पढ़ाई का समय भी बर्बाद हो रहा है। स्कूल इस कदर परेशान कर रहे हैं कि बच्चों में भी भय बना हुआ है।
डीसी के निर्देशों के बाद भी निजी स्कूल संचालक ने बच्चों को बस में नहीं बैठाया
रेवाड़ी। मंगलवार दोपहर उपायुक्त से मिलने के बाद बावल स्थित स्कूल में बच्चों को स्कूल संचालक ने उपायुक्त के निर्देश के बाद भी बस में नहीं बैठाया। बच्चों को स्कूल गेट पर ही छोड़ दिया गया। इसकी जानकारी बच्चों ने अभिभावकों को दी, जिसके बाद अभिभावक स्कूल पहुंचकर बच्चों को लेकर आए।
अभिभावकों ने मामले की शिकायत कसौला पुलिस थाना में भी दी गई है। वहीं हैरानी की बात यह है कि निजी स्कूल संचालकों द्वारा प्रशासन की हिदायत के बाद भी बच्चों के साथ इस तरह का व्यवहार लगातार किया जा रहा है। अभिभावक देवेंद्र कुमार के दो बच्चे, रूध निवासी अनिल कुमार का एक बच्चा और सुनील कुमार के एक बच्चे को बस में नहीं बैठाया गया। समाचार लिखे जाने तक स्कूल संचालक के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हो पाई। दूसरी तरफ औद्योगिक क्षेत्र सेक्टर-4 में स्थित एक स्कूल ने चार बच्चों को छुट्टी के बाद थाने पहुंचा दिया। मामले में कसौला थाना एसएचओ सुरेंद्र श्योराण ने बताया कि रात करीब आठ बजे सूचना मिलने पर अभिभावक अपने बच्चों को थाने से ले गए।
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मेरे बच्चों का प्रवेश नियम 134ए के तहत बावल स्थित एक स्कूल में हुआ है। स्कूल संचालकों ने इतना अधिक परेशान कर दिया है कि लगता नहीं है सरकार का किसी को कोई भय है। निशुल्क प्रवेश होने के बावजूद भी बड़ी मुश्किल से प्रवेश दिया जा रहा है। अब बच्चों को स्कूल बस में नहीं बैठा रहे हैं। उपायुक्त ने इस मामले में ठोस कार्रवाई का आश्वासन दिया है। - मुकेश कुमार, गढ़ी बोलनी
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मेरे बेटा का भी बावल स्थित स्कूल में प्रवेश हुआ है लेकिन बच्चे को बस में नहीं बैठाया जा रहा है। इस वजह से बच्चे बहुत परेशान हैं। अधिकारियों के यहां चक्कर लगाकर थक चुके हैं लेकिन कोई समाधान नहीं हो रहा है। स्कूल संचालक कभी किसी अधिकारियों से लिखित रूप में लाने को कहते हैं लेकिन जब वह दस्तावेज लेकर गए तो कहा यह मान्य ही नहीं है। - देवेंद्र सिंह आनंदपुर,
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बच्चों को स्कूल में बेहद परेशान किया जा रहा है। इस वजह वे स्कूल जाने से भी कतराने लगे हैं। स्कूल संचालक कभी फीस मांगते हैं तो कभी कोई अन्य शुल्क जमा कराने को कहते हैं। सरकार एवं प्रशासन आखिरकार क्या कर रहा हैं जैसे मानो सिस्टम का कोई मानने वाला ही नहीं है। - अनिल कुमार, रूध
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मेरे बेटे को स्कूल में प्रवेश नहीं दिया जा रहा है जबकि उसके नंबर भी काफी अधिक है। उससे कम नंबर वाले बच्चे को प्रवेश दे दिया गया है। छह स्कूल दिए जाने के बाद कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इसी तरह मेरे बहन के बच्चों को भी इसी तरह परेशान हो रहे हैं। कभी स्कूल तो कभी सचिवालय के चक्कर लगाने को मजबूर होना पड़ रहा है। - भतेरी देवी माजरा श्योराज