समालखा। जैन स्थानक नई अनाज मंडी में चातुर्मास में उपेंद्र मुनि महाराज ने बुधवार को लोगोंं को सरल स्वभाव और कर्म फल के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि कर्मफल भोग के बीच में ऐसा व्यक्ति दयाहीन है, धार्मिक नहीं है। फिर भले ही वह चाहे जितना पूजा पाठ, स्वाध्याय ध्यान करता रहे। कई लोग सीधे-सादे, सरल और ईमानदार व्यक्ति को धार्मिक नहीं मानते तथा वाचाल एवं आडंबर प्रिय व्यक्ति को धार्मिक मानते हैं पर यह पैमाना गलत है। सच्चा धार्मिक वही है जो एकांत में भी पाप नहीं करता, मार सकने पर भी नहीं मारता, जो सिर कटते रहने पर भी झूठ नहीं बोलता, जो रास्ते में पड़े रत्नों को भी नहीं उठाता जो निंदा स्तुति में रुष्ट तुष्ट नहीं होता, जो प्रदेश में जाकर भी अपने धर्म को नहीं छोड़ता, जो नवयौवना स्त्री को देखकर भी मन को विकृत नहीं करता। सच्चा धार्मिक मानव चाहे अकेला ही चाह अनेक आदमियों के मध्य वह पाप-कर्म कर ही नहीं सकता। उसे न तो भय ही धर्म से विचलित कर सकता है और न ही लोभ।
मुनि उपेंद्र ने बताया कि धार्मिक वह नहीं जो केवल भक्ति गीतों द्वारा पूजा करता हो लेकिन धार्मिक जीवन वह है। जिसके त्याग और बलिदान के गीत गाए जाते हैं। धार्मिक जीवन संघर्षात्मक होता है। स्तुतिगीतात्मक नहीं। धार्मिक जीवन के प्रतिक्षण पाप और धर्म का संघर्ष चलता रहता है। कर्तव्य क्षेत्र कुरुक्षेत्र के कौख और पाप रूपी आसुरी और देवी दोनों प्रकार की वृत्तियों का संघर्ष चल रहा है। पाप और धर्म दोनों के युद्ध में धार्मिक व्यक्ति -प्रतिक्षण धर्म को विजय दिलाता है और पाप को दूर भगाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में मौजूद श्रावकोंं ने उनकी बात को ध्यानपूर्वक सुना और जीवन में धारण करने की बात कही।