समालखा (पानीपत)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि पूजा पद्धति अनेकता को एकता का भाव पैदा करती हैं। ये प्रकृति से प्रेम को दर्शाती हैं। जनजाति के लोगों की पूजा पद्धति भी इसी तरह भिन्न हैं लेकिन ये भी अपने भाव समेट रही है। तभी भारत एक नजर आता है। ये विचार उन्होंने शनिवार को पट्टीकल्याणा गांव स्थित आरएसएस के सेवा साधना एवं ग्राम विकास केंद्र में लोगों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
वे वनवासी कल्याण आश्रम के तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यकर्ता सम्मेलन के दूसरे दिन सायंकालीन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत करने पहुंचे थे। इस दौरान यहां देश के सभी राज्यों से आए कार्यकर्ताओं ने अपने प्रांत के प्रकल्पों, गतिविधियों और कार्यों के बारे में बताया। डॉ. मोहन भागवत ने इनका अवलोकन किया। इससे पहले दूसरे दिन का शुभारंभ मणिपुर से आए जनजाति कार्यकर्ता ने स्थानीय भाषा में अपनी परंपरागत प्रार्थना से किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने जनजाति समाज की पूजा पद्धतियों के लिए लगाए स्टाॅलों के पंडाल का उद्धाटन किया। पंडाल के अलग-अलग स्टॉल पर देश के विभिन्न जनजातियों की ओर से अपने-अपने रीति-रिवाज, परंपरागत पूजा पद्धति को दिखाया गया था। जिसका उद्देश्य लोगों को भारत की एकात्मता के दर्शन से परिचित कराना है। इस आयोजन में विविधता के साथ एकत्व की अनुभूति मिली। इन प्रस्तुतियों में हिंदू धर्म-संस्कृति के साथ सभी को जोड़ने का संदेश दिया गया है। इस दौरान कार्यक्रम में देश भर से पहुंचे कार्यकर्ताओं ने ‘वर्तमान भारत में सांस्कृतिक संकट’ विषय पर चर्चा की।
कार्यक्रम में 14 पुस्तकों का किया विमोचन किया
इस अवसर पर रेखा नागर और डॉ. मदन सिंह वास्केल की लिखी पुस्तक ‘रानी दुर्गावती’, डॉ. राजकिशोर हांसदा की लिखी पुस्तक ‘संताल जनजाति की सृष्टि कथा’, रामलाल सोनी की ओर से लिखी गई ‘अपनों के अपने जगदेव राम’ और विवेकानंद की ओर से अंग्रेजी में लिखी गई ‘ग्लोबल जेनोसाइड ऑफ इंडीजीनस पीपल्स’ नामक पुस्तक सहित 14 पुस्तकों का विमोचन किया गया। राष्ट्रीय संगठन मंत्री अतुल जोग ने रानी दुर्गावती के इस वर्ष 500वीं जयंती और बिरसा मुंडा के 150 वीं जयंती वर्ष पर सभी केंद्रों और प्रकल्प स्थानों पर कार्यक्रम करने के लिए आह्वान किया।