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Panipat News: जिले में इंडस्ट्री जमीन का रेट तक फिक्स नहीं और न प्रदर्शनी तक के लिए जमीन

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शहर के उद्योगपतियों ने एक बार फिर से अपनी समस्याओं को सांसद और विधायक के सामने रखा। जिनके एक बार फिर से उन्हें आश्वासन ही मिले। शनिवार को हरियाणा चेंबर्स ऑफ कामर्स की एक बैठक होटल गोल्ड में आयोजित की गई। जिसमें उद्योगपतियों ने कहा कि जिले में इंडस्ट्री लगाने के लिए जमीन का एक रेट तक फिक्स नहीं है। कहीं लाखों रुपये गज जमीन है तो कहीं हजारों में ही सिमटी है। पानीपत इंडस्ट्रीज हब है, बाजवूद इसके यहां पर कोई भी प्रदर्शनी के लिए जगह तक नहीं है। जबकि अगर टैक्स वसूलने की बात हो तो यहां के उद्योगपतियों से ज्यादा से ज्यादा टैक्स भरवाया जाता है। कभी निगम, कभी एचएसआईडीसी तो कभी एचएसवीपी।
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उद्योगिक नगरी से टैक्स वसूलने के बाद भी यहां के उद्योग और उद्योगपतियों के सामने सैकड़ों परेशानियां हैं। जिनका आला अफसरों, नेताओं और मंत्रियों से मिलकर भी समाधान नहीं हो सका है। आज भी उद्योगपितयों को अपने का करवाने के लिए तीन तीन कार्यालयों में चक्कर काटने पड़ रहे हैं। चेयरमैन विनोद खंडेलवाल यहां के उद्योगपति लाखों खर्च करके विदेश जाते हैं, लेकिन यहां पर कोई प्रदर्शनी नहीं लग पाती क्योंकि प्रदेश का सबसे बड़ा हब होने के बाद भी यहां जमीन नहीं है। उद्योगपतियों को वेस्ट कपड़े का रिसाइल प्रोडेक्ट विदेश भेजने पर सब्सिडी तक नहीं मिलती, जबकि दूसरों को मिलती है। एमएसएमई की भी कोई सुविधा नहीं है।
सचिव मनीष अग्रवाल ने कहा कि वैसे तो प्रदेश में नारा है कि हरियाणा एक हरियाणवी एक, लेकिन सिर्फ पानीपत वालों से भेदभाव क्यों किया जा रहा है। उनको एनसीआर में क्यों डाला गया है। शहरी विधायक प्रमोद विज ने भी माना कि उद्योगपतियों को बिजली कनेक्शन लेने के लिए 67 जगह पर अनुमति लेने के लिए जाना पड़ता है। पानीपत के उद्योगपतियों को दो दो अलग अलग बिजली के बिल मिलते हैं। काफी ज्यादा सिक्योरिटी जमा करवाई जाती है। हरियाणा चेंबर्स ऑफ कामर्स में पानीपत के उद्योगपतियों की संख्या 358 है जबकि बाकी जगह सिर्फ 150 तक हैं। ये चेंबर सबसे बड़ा है, बावजूद सुविधाओं की कमी है।
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वाइस चेयरमैन मोहन लाल ने कहा कि गांव कुुराड़ का फ्री जोन खत्म कर दिया। सनौली बैकवर्ड जोन था तो खत्म कर दिया और बापौली को नहीं किया। बापौली को लो जोन में करवाया जाए। उन्होंने कहा कि जब पता था कि वे वहां इंडस्ट्री लगा रहे हैं फिर ऐसा क्यों किया गया। उन्होंने कहा कि ओल्ड इंडिस्ट्रियल एरिया को 1950 में नीलामी के प्लाटों पर दिया गया था, लेकिन यहां कोई पॉलिसी नहीं बनाई गई। न तो यहां बिजली है और न पानी है। नहरी पानी में भी मिट्टी आती है। यहां की जमीनों की रजिस्टरी तक नहीं होती। जिसकी वजह से यहां लोन रेट तक कम हैं। इस दौरान उद्योगपतियों ने कहा कि वे एचएसआईडीसी, एचएसवीपी और नगर निगम में उद्योगपति तीन जगह कैसे पैसे भरें।
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