मतलौडा जैन स्थानक में चातुर्मास सुनते समाज के लोग। जैन स्थानक
मतलौडा। मतलौडा जैन स्थानक में चल रहे चातुर्मास में वीरवार को नरेंद्र मुनि महाराज ने भगवान महावीर स्वामी के 27 भवों में से नयसार के भव का वर्णन करते हुए दान की महिमा पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि दान केवल वस्तु देने का नाम नहीं है, बल्कि वस्तु के प्रति अपने ममत्व और मोह को त्यागने का भाव है। जब व्यक्ति करुणा और दया की भावना से अपनी वस्तु दूसरे के कल्याण के लिए समर्पित करता है, तभी वह सच्चे अर्थों में दान धर्म कहलाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के लिए अपने पास मौजूद वस्तु से ममत्व हटाना सबसे कठिन कार्यों में से एक है। मोह और ममत्व व्यक्ति को वस्तुओं से बांधकर रखते हैं, जबकि दान की भावना उसे इस बंधन से मुक्त करती है। दान की भावना मनुष्य के भीतर करुणा जगाती है और आत्मकल्याण व मोक्ष के मार्ग को प्रशस्त करती है।
उन्होंने बताया कि जंगल में नयसार ने साधु-संतों को अपने भोजन का आत्मीयता और श्रद्धा के साथ दान किया। उनके भीतर जागृत हुई करुणा और सेवा की भावना ने उनके जीवन को ऐसी दिशा दी, जो आगे चलकर मोक्ष मार्ग की भूमिका बनी। गुरुदेव ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे अपनी सामर्थ्य के अनुसार आहार दान, औषधि दान, वस्त्र दान, शय्या दान और अन्य प्रकार के दान में सहभागी बनें। उन्होंने कहा कि दान मनुष्य के जीवन में पुण्य का संचय करने के साथ-साथ उसके भीतर त्याग और सेवा की भावना को भी मजबूत करता है।