संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। पसीना गांव की रानी को स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद न केवल उनके काम को नई पहचान मिली, बल्कि आय का एक स्थायी साधन भी मिला। वह करीब चार वर्ष पहले समूह से जुड़ी थीं। इसके बाद उन्होंने अपने अचार बनाने के हुनर के बारे में समूह की बैठकों में चर्चा की। समूह की महिलाओं ने उन्हें इस कार्य को व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
रानी ने बताया कि उनके परिवार में केवल दो सदस्य हैं—वे स्वयं और उनके पति। उनके पति काम करने में असमर्थ हैं, इसलिए परिवार की जिम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर उठाई। शुरुआत में वह मनरेगा में भी काम कर चुकी हैं। बाद में अन्य महिलाओं के सुझाव पर उन्होंने करीब चार वर्ष पहले स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का निर्णय लिया।
उन्होंने बताया कि समूह की बैठकों में महिलाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया जाता था। उन्हें पहले से ही विभिन्न प्रकार के अचार बनाने का अनुभव था, लेकिन इसे आय के स्रोत के रूप में अपनाने का विचार कभी नहीं आया था। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने अपने इस हुनर को व्यवसाय में बदलने का फैसला किया।
आज रानी अपने हाथों से तैयार अचार को बाजारों और विभिन्न मेलों में बेचती हैं। उनके उत्पादों को लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है, जिससे उनकी पहचान बढ़ी है और नियमित आय भी होने लगी है। इस कमाई से उनके घर के छोटे-मोटे खर्च आसानी से पूरे हो जाते हैं।
रानी का कहना है कि यदि महिलाओं को सही मार्गदर्शन और अवसर मिलें, तो वे किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं। उनके अनुसार, स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ सामाजिक सम्मान भी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पसीना गांव की रानी ने आत्मनिर्भरता की राह चुनी, घरेलू कौशल को बनाया आय का साधन
फोटो- 1
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पानीपत। पसीना गांव की रानी को स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद न केवल उनके काम को नई पहचान मिली, बल्कि आय का एक स्थायी साधन भी मिला। वह करीब चार वर्ष पहले समूह से जुड़ी थीं। इसके बाद उन्होंने अपने अचार बनाने के हुनर के बारे में समूह की बैठकों में चर्चा की। समूह की महिलाओं ने उन्हें इस कार्य को व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
रानी ने बताया कि उनके परिवार में केवल दो सदस्य हैं—वे स्वयं और उनके पति। उनके पति काम करने में असमर्थ हैं, इसलिए परिवार की जिम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर उठाई। शुरुआत में वह मनरेगा में भी काम कर चुकी हैं। बाद में अन्य महिलाओं के सुझाव पर उन्होंने करीब चार वर्ष पहले स्वयं सहायता समूह से जुड़ने का निर्णय लिया।
उन्होंने बताया कि समूह की बैठकों में महिलाओं को स्वरोजगार और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित किया जाता था। उन्हें पहले से ही विभिन्न प्रकार के अचार बनाने का अनुभव था, लेकिन इसे आय के स्रोत के रूप में अपनाने का विचार कभी नहीं आया था। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने अपने इस हुनर को व्यवसाय में बदलने का फैसला किया।
आज रानी अपने हाथों से तैयार अचार को बाजारों और विभिन्न मेलों में बेचती हैं। उनके उत्पादों को लोगों की अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है, जिससे उनकी पहचान बढ़ी है और नियमित आय भी होने लगी है। इस कमाई से उनके घर के छोटे-मोटे खर्च आसानी से पूरे हो जाते हैं।
रानी का कहना है कि यदि महिलाओं को सही मार्गदर्शन और अवसर मिलें, तो वे किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल कर सकती हैं। उनके अनुसार, स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ सामाजिक सम्मान भी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।