पानीपत। राजाखेड़ी गांव में श्रेयांस मुनि ने त्याग पर प्रवचन किया। मुनि ने बताया कि कोई भी त्याग करो, उसमें वीतराग भाव आना चाहिए। साधु का त्याग और श्रावक का त्याग अलग-अलग होते हुए भी दोनों आत्मा की शुद्धि के लिए होते हैं। केवल उपदेश देना तो सिर्फ पानी की लकीर है पर आचरण पत्थर की लकीर है। आचरण ही जैन धर्म का वास्तविक आधार है। त्याग जीवन में अवश्य है। जैसे बंद पड़ी कार पर टैक्स, खाली मकान पर खर्च या बिना उपयोग के मीटर पर न्यूनतम बिल लगता ही है। वैसे ही बिना त्याग किए पाप का न्यूनतम परिणाम अवश्य भुगतना पड़ता है। त्याग से समुद्र जैसा पाप घटकर बूंद के समान रह जाता है। जीवन में पाप करने से बचना चाहिए। संवाद