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आचरण और त्याग से ही साधना संभव : अरुण चंद्र महाराज

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अग्रवाल मंडी में प्रवचन सुनते श्रावक। स्रोत : स्वयं
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- अग्रवाल मंडी स्थित जैन स्थानक में युवा प्रेरक अरुण चंद्र महाराज ने किए प्रवचन
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संवाद न्यूज एजेंसी

पानीपत। अग्रवाल मंडी स्थित जैन स्थानक में चल रहे चातुर्मास में युवा प्रेरक अरुण चंद्र महाराज ने प्रवचन दिए। अरुण मुनि के साथ उनके शिष्य अभिषेक मुनि, अभिनंदन मुनि भी पाट पर विराजमान रहे। अरुण मुनि ने कहा कि यदि भगवान महावीर की साधना को पाना है तो छह आवश्यक प्रत्याख्यान का पालन हर जैन अनुयायी के लिए अनिवार्य है। त्याग, आचरण, संयम और भाव-व्यवहार का सम्मिलित स्वरूप ही छठा प्रत्याख्यान है। साधना की शुरुआत बाहरी त्याग से होती है और फिर आंतरिक त्याग (भाव) की गहराई तक पहुंचना आवश्यक है।
उन्होने कहा कि भोजन का त्याग केवल शुरुआत है। वास्तविक साधना तब है जब भोजन की आसक्ति समाप्त हो जाए। कोई भी त्याग करो, उसमें वीतराग भाव आना चाहिए। साधु का त्याग और श्रावक का त्याग अलग-अलग होते हुए भी दोनों आत्मा की शुद्धि के लिए होते हैं। मुनि ने अपने गुरु सुदर्शन लाल महाराज के वचनों का स्मरण करते हुए कहा कि अप्पानम्मं वोसारमि और तस्स मिच्छामी। यह दो वचन ऐसे है जो इन्हें जीवन में उतार लेता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। केवल उपदेश देना तो सिर्फ पानी की लकीर है पर आचरण पत्थर की लकीर है। आचरण ही जैन धर्म का वास्तविक आधार है। त्याग जीवन में अवश्य है। जैसे बंद पड़ी कार पर टैक्स, खाली मकान पर खर्च या बिना उपयोग के मीटर पर न्यूनतम बिल लगता ही है। वैसे ही बिना त्याग किए पाप का न्यूनतम परिणाम अवश्य भुगतना पड़ता है।
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प्रत्याख्यान (त्याग ) से समुद्र जैसा पाप घटकर बूंद के समान रह जाता है। प्रत्याख्यान कोई बंधन नहीं बल्कि सुरक्षा कवच है। यह साधक को पाप की ओर उठे कदमों को बढ़ने से रोकता है और सावधान करता है और पाप करने से बचा लेता है।
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राजाखेड़ी गांव में रोहित मुनि ने किए प्रवचन
राजाखेड़ी गांव में चल रहे चातुर्मास में श्रेयांश मुनि व रोहित मुनि ने प्रवचन दिए। प्रवचन सुनने के लिए आस-पास के क्षेत्रों से भी सैकड़ों श्रावक पहुंचे। श्रेयांश मुनि ने जैन धर्म के बढ़ते प्रभाव व जैन मुनियों की जीवन शैली के बारे में बताया। रोहित मुनि ने श्रावकों को चातुर्मास की पवित्रता के बारे में बताया। रोहित मुनि ने बताया कि चातुर्मास में जैन मुनि चार महीने तक चातुर्मास में प्रवेश कर रहते हैं। ये चार महीने जैन धर्म में पवित्र माने जाते हैं। जैन मुनि चातुर्मास शुरू होने से पहले ही एक स्थान पर जाकर ठहर जाते हैं और चार महीने तक वहीं पर रहते हुए प्रवचन देते हैं। श्रेयांश मुनि ने बताया कि जैन धर्म का प्रभाव बढ़ने लगा है। प्रवचन सुनने के लिए आने वाले श्रावकों की संख्या बढ़ने लगी है। जैन मुनि चार महीने तक एक साथ पर रहकर प्रवचन देते हैं। ये चार महीने जैन मुनियों के लिए पवित्र होते हैं।
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