फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

परी अपनों के पास अब मुस्कान पर न्योछावर हैं स्टाफ नर्सें

Fri, 30 Oct 2015 12:03 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला पानीपत
विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

पानीपत। परी के जाते ही सिविल अस्पताल की स्टाफ नर्सों का पूरा लाड़-प्यार जाटल रोड पर लावारिस मिली बच्ची के लिए उमड़ पड़ा है। स्टाफ नर्स ने इस बच्ची का नाम मुस्कान रखा है। विदित रहे कि 15 दिन पहले जाटल रोड फ्लाईओवर के नजदीक एक खाली प्लाट में नवजात बच्ची मिली थी। उसको सिविल अस्पताल की नर्सरी में रखवा गया दिया था। स्टाफ नर्स ने वीरवार को बच्ची को मुस्कान नाम दिया।

परी की खुशी देखने सिविल अस्पताल में उमड़ा लोगों का हुजूम
सिविल अस्पताल में 17 जून को जन्मी बच्ची परी को माता-पिता को सौंपा जाता देखेने के लिए वीरवार सुबह काफी संख्या में शहरवासी सिविल अस्पताल में पहुंच गए। इससे पहले लोगों ने लघु सचिवालय पहुंचना शुरू कर दिया था। पहले लघु सचिवालय स्थित एसपी कार्यालय में रिपोर्ट का खुलासा करने की योजना थी। पुलिस अधीक्षक ने ऐन वक्त पर सिविल अस्पताल में ही बच्ची देने का फैसला लिया। सिविल अस्पताल में 11:30 बजे बच्ची को रामनगर निवासी कविता और अमित को सौंपा जाना था। पुलिस की देखरेख में उनको सिविल अस्पताल लाया गया। यहां पर सीएमओ कार्यालय में प्रशासनिक व विभागीय अधिकारियों ने उनको डीएनए रिपोर्ट पढ़कर सुनाई और तकनीकी पहलुओं को समझाया। पिता अमित, मां कविता के साथ कविता के ससुर राजबीर भी बात को मान गए। इसके बाद कागजी कार्रवाई शुरू हुई और इन सबके पूरा होने के बाद 1:35 बजे परी को नर्सरी से बाहर लाया गया। इसका पूरा टाइम रजिस्टर में दर्ज किया गया और सीसीटीवी की रिकार्डिंग भी की गई।
विज्ञापन


इस दौरान एमएस डॉ. एसके गुप्ता, डिप्टी सीएमओ डॉ. नवीन सुनेजा, डीएसपी शहर दलबीर सिंह, एसएचओ शहर सुरेश कुमार, बस अड्डा चौकी प्रभारी भीम सिंह, टीम आवाज की सदस्य सविता आर्या, गौरव लिख्खा, भाजपा महामंत्री डॉ. सुरेंद्र टुटेजा, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के संयोजक अशोक छाबड़ा, मनोज शर्मा,  कुसुम शर्मा, सुमन भल्ला, गीता गाबा व प्रोमिला लठवाल मौजूद रहे।

टीम आवाज ने सांसद व उनकी पत्नी का जताया आभार
टीम आवाज और कई संगठनों ने बुधवार को परी और कविता की डीएनए रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग को लेकर एक दिन का अनशन रखा था। सांसद अश्विनी चोपड़ा की धर्मपत्नी किरण शर्मा चोपड़ा इसको लेकर आगे आईं। उन्होंने चंडीगढ़ लैब में बात की और बच्ची के डीएनए की रिपोर्ट जल्द जारी करने को कहा। टीम आवाज की सदस्य सविता आर्या ने बताया कि वे किरण शर्मा चोपड़ा का इस मामले में सहयोग देने पर आभार व्यक्त करती हैं। उन्होंने सांसद के पीए गौतम को उनके पास भेजा और पूरे मामले से प्रशासनिक अधिकारियों को अवगत कराया।

परी पर अब तक सवा दो लाख
सिविल अस्पताल के जानकारों की मानें तो परी पर अब तक सवा दो लाख रुपये खर्च आ चुका है। अकेले 1.90 लाख रुपये स्वास्थ्य विभाग का खर्च आया है। इसमें बच्ची की देखरेख को अलग से स्टाफ और अन्य सुविधाओं पर खर्च शामिल है। इसके अलावा करीब 50 हजार रुपये डीएनए का चार्ज बताया गया है। मुख्यालय ने इसकी पूरी रिपोर्ट भी मांगी है।

हर 15वें दिन कराना होगा मेडिकल परीक्षण
प्रशासन व पुलिस ने बच्ची को असल मां-बाप को सौंपते हुए उसके भविष्य की सुरक्षा को ध्यान में रखा। उन्होंने रामनगर निवासी अमित और उसकी पत्नी समेत बाकी लोगों को सीएमओ कार्यालय में करीब आधा घंटा तक समझाया और उनको बेटियों की उपलब्धियों के बारेे में बताया। उन्होंने कहा कि बच्ची का ठीक से पालन-पोषण करें और हर 15वें दिन सिविल अस्पताल में उसका मेडिकल परीक्षण कराएं। इस दौरान किसी तरह की परेशानी या दिक्कत आने पर प्रशासन या पुलिस को अवगत कराएं।


अस्पताल प्रशासन सतर्क होता तो न आती ये नौबत
किसी ने खुशी नाम दिया तो किसी ने परी। सिविल अस्पताल प्रशासन की एक छोटी सी लापरवाही के चलते बच्ची परी को 136 दिन अपनों की गोद की बजाय सिविल अस्पताल के पालने में बिताने पड़े। हालांकि अस्पताल में नर्सिंग स्टाफ ने अपने बच्चा जैसा प्यार दिया और परी को परिजनों को सौंपते समय उनको आंसू तक आ गए।
18 जून को स्टाफ नर्स बच्चा देने में सावधानी बरतती तो आज यह नौबत नहीं आती और न ही अस्पताल पर आरोप लगते। बच्ची पैदा होने की सूचना तो सही दी पर दूध पिलाने के लिए बच्चा देने से परिवार को शक हो गया। और जब उनको बाद में बच्ची दी गई तो उन्होंने हंगामा खड़ा कर दिया। बात यहां तक पहुंची कि दो डॉक्टरों और स्टाफ नर्स को मुकदमे का सामना करना पड़ा। एक डॉक्टर तो खुद को सही साबित करने के लिए हाईकोर्ट तक पहुंच गया। फिर डीएनए टेस्ट की लंबी प्रक्रिया से गुजरते हुए अब जाकर मामले का पटाक्षेप हुआ।

पुलिस भी शुरुआत से करती रही टालमटोल
पुलिस परी के मामले में पहले दिन से ही टालमटोल कर रही थी। परिजनों को कोर्ट का सहारा लेकर मुकदमा दर्ज कराना पड़ा। उसके बाद उनकी मांग पर पीजीआई चंडीगढ़ में डीएनए टेस्ट कराने में अनदेखी की गई। पुलिस अधिकारी बार-बार मधुबन से तारीख लेकर आते रहे। इसमें सरकार का दखल नहीं पड़ता तो शायद ही पुलिस और प्रशासन बच्ची को अपनों को दिला पाते। एसपी राहुल शर्मा अंत तक वही टालमटोली करते रहे। बुधवार शाम को ही डीएनए टेस्ट रिपोर्ट आने के बाद खुलासे से बचते रहे। रिपोर्ट लीक होने के बाद मीडिया को वीरवार सुबह 11 बजे लघु सचिवालय स्थित एसपी कार्यालय में रिपोर्ट के खुलासे की बात कही, लेकिन वे 11 बजे पलट गए और उन्होंने सिविल अस्पताल में बच्ची की रिपोर्ट की जानकारी देने का एलान कर दिया।




परी को लेकर अब तक
17 जून को सिविल अस्पताल में परी का जन्म हुआ।
18 जून को रामनगर निवासी कविता ने बच्चा बदलने का आरोप लगाते हुए बच्ची को ठुकरा दिया।
20 जून को थाना शहर पुलिस ने उसकी शिकायत पर दो डाक्टर और एक नर्स के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया।
29 जून को  मधुबन में डीएनए की पहली तारीख मिली।
12 अगस्त को दूसरी तारीख मधुबन से मिली।
04 सितंबर की डीएनए को लेकर तीसरी तारीख मिली।
10 सितंबर को लघु सचिवालय में बैठक हुई। यहां रामनगर की कविता के साथ ऊंचा समाना और नैन गांव की कविता नाम की उन दो महिलाओं का डीएनए टेस्ट कराने का फैसला हुआ जिनकी डिलीवरी 17 जून के आसपास ही हुई थी।
28 सितंबर को बच्ची परी और ऊंचा समाना एवं नैन गांव की कविता का चंडीगढ़ में डीएनए टेस्ट कराया गया।
29 सितंबर को हाईकोर्ट में मामले को सुनवाई हुई और हाईकोर्ट ने एक अक्तूबर को डीएनए टेस्ट कराकर रिपोर्ट देने के आदेश दिए।
01अक्तूबर को परी व रामनगर निवासी कविता का डीएनए टेस्ट चंडीगढ़ स्थित लैब में कराया गया।

ऊंचा समाना व नैन गांव में भी खुशी
परी को अपनों की गोद मिली तो खुशी करनाल के ऊंचा समाना और पानीपत के नैन गांव में भी मनाई गई। ऊंचा समाना निवासी कविता पत्नी कमल और नैन गांव की कविता पत्नी प्रदीप की भी डिलीवरी उसी दिन सिविल अस्पताल में हुई थी। पहले नैन गांव की कविता को जांच के दायरे में लाया गया था लेकिन प्रशासन ने 10 सितंबर की बैठक में ऊंचा समाना निवासी कविता को भी शामिल किया था। नैन निवासी प्रदीप ने बताया कि वह अपनी जगह सच्चे थे। ऊंचा समाना निवासी कमल ने बताया कि सच सामने आने पर उनका परिवार बहुत खुश है। सबसे ज्यादा खुशी इस बात की है कि माता-पिता के प्यार से वंचित बच्ची को उसका हक मिल गया।
विज्ञापन



वर्जन
परी के साथ डॉक्टर और स्टाफ नर्स का लगाव हो गया था। वे छुट्टी के दिन भी अस्पताल में आते-जाते रहते थे। बच्ची को किसी तरह की तकलीफ नहीं होने दी गई। उन्होंने बच्ची को शिफ्ट करने का भी विचार किया था, लेकिन स्टाफ और लोगों के लाड़ प्यार के आगे ऐसा कदम नहीं उठा सके। आज बच्ची को अपनों की गोद मिल गई है। अस्पताल में लापरवाही कुछ रही होगी उसको दूर किया जाएगा। अस्पताल में भविष्य में ऐसी घटनाओं को न होने से रोकने के पूरे प्रयास किए जाएंगे। -डॉ. इंद्रजीत धनखड़, सीएमओ पानीपत
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें